तालीम तो मिली, मगर तहजीब कहीं खो गई: न्यू जर्सी में बेटों की करोड़ों-अरबों की दुनिया, जौनपुर के आश्रम में पिता के हिस्से आया अकेलापन

 इस बुजुर्ग की दर्दभरी दास्तां पढ़कर और सुनकर आपके आंखें भर जाएगी

जौनपुर। कहते हैं कि मां-बाप अपनी औलाद को पढ़ाते इसलिए नहीं कि वह सिर्फ बड़ा आदमी बने, बल्कि इसलिए कि वह एक अच्छा इंसान बने और बुढ़ापे में अपने मां-बाप का सहारा बने। मगर बदलते वक्त की एक कड़वी तस्वीर जौनपुर के एक वृद्धाश्रम में दिखाई देती है, जहां कभी विदेशों में इंजीनियर के रूप में काम कर चुके 83 वर्षीय सिलविंदर सिंह आज जिंदगी के अंतिम पड़ाव में अपनों के बीच नहीं, बल्कि आश्रम की चारदीवारी में दिन काट रहे हैं।


उनकी कहानी का सबसे दर्दनाक पहलू यह नहीं कि उनके पास धन नहीं है, बल्कि यह है कि उनके अनुसार उनके तीनों बेटे विदेश में बेहद संपन्न होने के बावजूद उनके साथ नहीं हैं। वे बताते हैं कि तीनों बेटे अमेरिका के न्यू जर्सी में रहते हैं। एक चार्टर्ड अकाउंटेंट है, दूसरा मैकेनिकल इंजीनियर और तीसरे का होटल एवं शराब का कारोबार है। उनके मुताबिक बेटे आर्थिक रूप से बेहद सफल हैं और मुंबई में उनके नाम शानदार फ्लैट भी हैं, लेकिन वे भारत आना नहीं चाहते।


यही वह जगह है जहां सवाल उठता है—तालीम तो मिली, मगर तहजीब कहां चली गई?


जिस पिता ने अपनी जिंदगी की कमाई, अपना सुख और अपना भविष्य बेटों के नाम कर दिया, उसी पिता के हिस्से में बुढ़ापे में एक ऐसा अकेलापन आया, जिसे न डॉलर भर पा रहे हैं और न बैंक खाते।


सिलविंदर सिंह की आंखों में आज भी अपने बेटों की बचपन वाली तस्वीरें बसी हैं। वे बताते हैं कि उन्होंने बेटों को पढ़ाने-लिखाने में अपनी जिंदगी लगा दी। उनकी कोशिश थी कि बच्चे उनसे बेहतर जिंदगी जिएं, ऊंचाइयों तक पहुंचें और दुनिया में नाम कमाएं।


बच्चे पढ़े, विदेश गए और अपने पैरों पर खड़े हुए। पिता की मेहनत सफल हुई। लेकिन उम्र के जिस पड़ाव पर पिता को बच्चों की जरूरत थी, उसी समय उनके और बेटों के बीच हजारों किलोमीटर की दूरी ही नहीं, बल्कि भावनात्मक दूरी भी बढ़ गई।


सिलविंदर सिंह के मुताबिक बेटे उनसे अमेरिका आने के लिए कहते हैं और आर्थिक मदद की बात भी करते हैं। मगर उनका शरीर अब 20 घंटे की हवाई यात्रा की इजाजत नहीं देता। वे कहते हैं कि जब बिस्तर पर ठीक से बैठना मुश्किल है तो इतनी लंबी हवाई यात्रा कैसे कर सकते हैं।


बेटों की ओर से पैसे भेजकर खाना बनाने के लिए किसी महिला को रखने की बात कही जाती है। लेकिन बुजुर्ग का सवाल है—“पैसे से खाना बन सकता है, लेकिन क्या पैसे से बेटे का हाथ सिर पर रखा जा सकता है? क्या पैसे से अकेलेपन में किसी अपने की आवाज खरीदी जा सकती है?”


बुजुर्ग के शब्दों में इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा दर्द छिपा है। उनका कहना है कि पैसे से पेट भरा जा सकता है, दवाइयां खरीदी जा सकती हैं, नौकर रखा जा सकता है, लेकिन बुढ़ापे की वह जरूरत पूरी नहीं की जा सकती जिसमें इंसान को अपने किसी अपने की जरूरत होती है।


उन्हें खाना खिलाने वाला मिल सकता है, दवा देने वाला मिल सकता है, कमरे की सफाई करने वाला मिल सकता है, लेकिन वह बेटा नहीं मिल सकता जिसके लिए कभी उन्होंने रातों की नींद और दिन का चैन कुर्बान किया था।


यही फर्क है तालीम और तहजीब में।


तालीम इंसान को डॉक्टर, इंजीनियर, सीए और कारोबारी बना सकती है, लेकिन तहजीब ही उसे यह सिखाती है कि जिस मां-बाप ने उंगली पकड़कर चलना सिखाया, उनके कांपते हाथों को बुढ़ापे में थामना भी हमारी जिम्मेदारी है।


इंजीनियर पिता ने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों के नाम कर दी

सिलविंदर सिंह की जिंदगी संघर्ष और उपलब्धियों से भरी रही है। वे बताते हैं कि उनके पिता फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया में इलेक्ट्रिकल इंजीनियर थे और बाद में इंग्लैंड चले गए थे। उन्होंने खुद मुंबई से इंजीनियरिंग की और विदेशों में बड़ी ऑयलफील्ड कंपनियों में काम किया।


एक समय उनकी मासिक आय करीब ढाई लाख रुपये तक थी। उनके पास पैसा था, प्रतिष्ठा थी और विदेशों में काम करने का अनुभव था। लेकिन उन्होंने अपनी कमाई को अपने सुख-सुविधाओं पर खर्च करने के बजाय बच्चों की पढ़ाई और उनके भविष्य पर लगा दिया।


उन्होंने बेटों को पढ़ाया, उन्हें आगे बढ़ाया और उनकी शादियों में भी अपनी जिंदगी की जमा-पूंजी लगा दी।


उन्हें शायद तब यह एहसास नहीं था कि जिस भविष्य को वे अपने बेटों के लिए सुरक्षित कर रहे हैं, उसी भविष्य में उनके अपने बुढ़ापे के लिए कोई जगह बची होगी या नहीं।


1994 में पत्नी गईं तो परिवार की तस्वीर भी बदल गई

सिलविंदर सिंह की जिंदगी का सबसे बड़ा सदमा वर्ष 1994 में आया, जब उनकी पत्नी कैंसर से जंग हार गईं। उन्होंने मुंबई के नानावटी अस्पताल में उनके इलाज के लिए दो बड़े ऑपरेशन कराए। इलाज में करीब 28 लाख रुपये खर्च हुए, लेकिन पत्नी को बचाया नहीं जा सका।


वे बताते हैं कि पत्नी के रहते परिवार जुड़ा हुआ था। बच्चे मां से जुड़े थे और घर में अपनापन था। लेकिन मां के जाने के बाद धीरे-धीरे परिवार बिखरता चला गया।


एक मां के जाने से सिर्फ एक जीवन खत्म नहीं होता, कई बार वह डोर भी टूट जाती है जो पूरे परिवार को एक साथ बांधे रखती है।


सूरत की हीरा कंपनी से जौनपुर के वृद्धाश्रम तक

रिटायरमेंट के बाद भी सिलविंदर सिंह ने खुद को निष्क्रिय नहीं किया। उन्होंने सूरत की एक हीरा कंपनी में मैनेजर के रूप में काम किया।


वहीं उनकी मुलाकात जौनपुर के रहने वाले दो लोगों से हुई। उनके अनुसार उन्हीं लोगों ने उन्हें जौनपुर के एक आश्रम के बारे में बताया और आश्रम के व्यवस्थापकों से संपर्क कराया।


इसके बाद वे जौनपुर आ गए।


जिस आदमी ने जिंदगी का बड़ा हिस्सा विदेशों में काम करते हुए बिताया, जिसकी पढ़ाई इंजीनियरिंग तक हुई, जिसने अपने परिवार के लिए जिंदगी भर मेहनत की—वही आज जौनपुर के एक वृद्धाश्रम में रह रहा है।


“इन्होंने मुझे दूसरा जन्म दिया”

आश्रम के लोगों के प्रति सिलविंदर सिंह के मन में गहरी कृतज्ञता है। वे कहते हैं कि यहां रहने वालों ने उन्हें सिर्फ छत नहीं दी, बल्कि जीने की वजह दी है।


उनके शब्दों में—“इन्होंने मुझे दूसरा जन्म दिया है।”


आश्रम में उन्हें भोजन मिलता है, देखभाल मिलती है और सबसे बड़ी बात—अपनापन मिलता है।


शायद यही वजह है कि उनकी आंखों में अपने बेटों के लिए जितनी शिकायत है, उससे कहीं ज्यादा आश्रम के लोगों के लिए आभार है।


वे कहते हैं कि यहां के लोग निःस्वार्थ भाव से सेवा करते हैं और उन्हें सम्मान देते हैं। उन्हें वह अपनापन यहां मिला, जिसकी तलाश अपने परिवार में थी।


सवाल बेटों से नहीं, बदलती सोच से है

यह कहानी केवल एक बुजुर्ग पिता की कहानी नहीं है। यह उस बदलती सामाजिक सोच का आईना भी है, जहां सफलता का पैमाना बैंक बैलेंस, बड़ी नौकरी, विदेश में घर और करोड़ों-अरबों का कारोबार बनता जा रहा है।


लेकिन सफलता की इस दौड़ में कहीं पीछे छूट रहा है तो वह है—रिश्तों का मूल्य।


आज कोई बेटा अमेरिका में बैठकर करोड़ों कमाए, कोई बेटी विदेश में बड़ी कंपनी में काम करे, कोई संतान दुनिया के किसी भी कोने में अपनी पहचान बनाए—इसमें कोई बुराई नहीं। मां-बाप की सबसे बड़ी खुशी भी यही होती है कि उनकी संतान उनसे आगे बढ़े।


लेकिन सवाल तब पैदा होता है जब कामयाबी की ऊंचाई बढ़ती जाती है और मां-बाप के लिए दिल में जगह छोटी होती जाती है।


सिलविंदर सिंह के मामले में भी यही दर्द दिखाई देता है। उनके मुताबिक बेटे आर्थिक रूप से संपन्न हैं, मदद के लिए पैसे भेजते हैं, लेकिन वह साथ नहीं है जिसकी उन्हें इस उम्र में सबसे ज्यादा जरूरत है।


मां-बाप को रकम नहीं, रिश्ते की जरूरत होती है

बुढ़ापा वह समय होता है जब इंसान फिर से बच्चे जैसा हो जाता है। उसे दवा से ज्यादा किसी के पूछने की जरूरत होती है—“पापा, दवा खा ली?”


उसे भोजन से ज्यादा इस बात की जरूरत होती है कि कोई पास बैठकर पूछे—“आज तबीयत कैसी है?”


उसे पैसे से ज्यादा उस हाथ की जरूरत होती है, जो सीढ़ियों से उतरते समय पकड़ ले।


और उसे किसी नौकर से ज्यादा उस बेटे की जरूरत होती है, जिसे कभी उसने अपने कंधे पर बैठाकर दुनिया दिखाई थी।


सिलविंदर सिंह के पास शायद आज भी बेटों की सफलता पर गर्व करने की वजह है। लेकिन उस गर्व के साथ एक टीस भी है—क्या मेरी परवरिश में कोई कमी रह गई थी, या सफलता की इस दौड़ में तहजीब ही कहीं पीछे छूट गई?


आखिरी सवाल—तालीम बड़ी हुई या इंसानियत छोटी?

यह कहानी किसी एक परिवार को कठघरे में खड़ा करने से ज्यादा समाज के सामने एक आईना रखने की कोशिश है।


आज हम बच्चों को महंगे स्कूलों में पढ़ाते हैं, उन्हें विदेश भेजते हैं, बड़े कॉलेजों में दाखिला दिलाते हैं और चाहते हैं कि वे दुनिया में नाम कमाएं।


लेकिन क्या हम उन्हें यह भी सिखा रहे हैं कि मां-बाप की सेवा कोई एहसान नहीं, बल्कि संस्कार और जिम्मेदारी है?


क्योंकि डिग्री दीवार पर टंगी रह सकती है, करोड़ों बैंक खाते में पड़े रह सकते हैं, आलीशान मकान खाली खड़े रह सकते हैं और विदेशों में कारोबार चलता रह सकता है।


लेकिन जब मां-बाप की आंखें दरवाजे पर किसी अपने के आने का इंतजार करती हैं, तब दौलत नहीं, सिर्फ रिश्ते काम आते हैं।


जौनपुर के इस वृद्धाश्रम में बैठे सिलविंदर सिंह की कहानी शायद आने वाली पीढ़ी से सिर्फ एक सवाल पूछती है—


“बेटा, मैंने तुम्हें तालीम तो दे दी थी... क्या तुम्हें तहजीब देना भूल गया था?”


और शायद यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा दर्द है—

औलादें कामयाब हो गईं, मगर उस कामयाबी में मां-बाप के लिए जगह कहीं खो गई।

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