357 साल बाद मिला एक कुल का बिछड़ा ब्राह्मण परिवार, डेहरी में भावनाओं का सैलाब

 औरंगजेब के दौर में अलग हुए थे परिवार के सदस्य, 2026 में फिर जुड़े रिश्तों के तार

काशी-जौनपुर से पहुंचे ब्राह्मण परिवार के लोग, नौशाद अहमद दुबे को माना अपना बड़ा

जौनपुर। इतिहास के लंबे सफर में 357 वर्ष का इंतजार शनिवार को उस समय खत्म हो गया, जब केराकत क्षेत्र के डेहरी गांव में एक ही कुल के बिछड़े परिवारों का भावुक मिलन हुआ। आंखों में आंसू, दिल में अपनों से मिलने की तड़प और सदियों पुरानी स्मृतियों के बीच जब काशी और जौनपुर से आए ब्राह्मण परिवार के लोग अपने ही कुल के नौशाद अहमद दुबे के घर पहुंचे तो माहौल भावनाओं से भर गया। एक-दूसरे को माला पहनाकर स्वागत किया गया और गले मिले तो देर तक अलग नहीं हुए। किसी की आंखों में खुशी थी तो किसी की आंखों में सदियों पुराने बिछोह का दर्द।

आयोजकों के अनुसार, वर्ष 1669 में मुगल शासक औरंगजेब के दौर की परिस्थितियों में एक ही खानदान के कुछ सदस्य अलग हो गए थे। परिवार की शाखाएं अलग-अलग दिशाओं में फैलती चली गईं और आठ पीढ़ियां गुजर गईं, लेकिन बिछड़े रिश्तों का मिलन नहीं हो सका। समय बदला, शासन बदले और पीढ़ियां बदलती रहीं, मगर अपनों से मिलने की कहानी अधूरी ही रही। शनिवार को डेहरी गांव में आयोजित कुल मिलन कार्यक्रम ने उस अधूरी कहानी को जैसे नया अध्याय दे दिया।


शादी के कार्ड ने खोल दी सदियों पुरानी रिश्तेदारी की राह


बताया गया कि विशाल भारत संस्थान के प्रदेश अध्यक्ष नौशाद अहमद दुबे के आठ पीढ़ी पहले के पूर्वज लाल बहादुर दुबे रानी की सराय, आजमगढ़ के निवासी थे। आयोजकों के अनुसार तत्कालीन परिस्थितियों में उन्होंने इस्लाम स्वीकार किया और रानी की सराय छोड़कर जौनपुर के डेहरी गांव में आकर बस गए। बताया गया कि लाल बहादुर दुबे जमींदार थे और उन्होंने हजारी सिंह से डेहरी की जमींदारी खरीदी थी।


परिवार के दूसरे सदस्य और रिश्तेदार अलग-अलग स्थानों पर जाकर बसते गए। पीढ़ियां गुजरती रहीं और रिश्तों की कड़ियां स्मृतियों में ही रह गईं। फिर नौशाद अहमद दुबे की बेटी की शादी का निमंत्रण पत्र इस सदियों पुराने रिश्ते की खोज का माध्यम बना। शादी के कार्ड पर ‘दुबे’ उपनाम देखकर परिवार की चर्चा शुरू हुई। इसके बाद पूर्वजों के नाम और पारिवारिक इतिहास की खोज शुरू हुई तो पूर्वांचल के विभिन्न हिस्सों में कई रिश्तेदारों के बारे में जानकारी सामने आई।


जौनपुर के शैलेन्द्र शुक्ला ने बताया कि नौशाद अहमद दुबे उनकी बुआ की ओर से रिश्तेदार हैं। वहीं बनारस के विवेक मिश्रा ने उन्हें अपनी ननिहाल पक्ष का रिश्तेदार बताते हुए मामा का रिश्ता बताया।


चार वर्ष की खोज के बाद जुड़ीं रिश्तों की कड़ियां


357 वर्षों के इस बिछोह के बाद परिवार की कड़ियों को जोड़ने में विशाल भारत संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं इतिहासकार डॉ. राजीव श्रीगुरु और उनकी शोध टीम की भूमिका रही। आयोजकों के अनुसार टीम ने करीब चार वर्षों तक परिवार के पूर्वजों, रिश्तेदारों और पारिवारिक इतिहास से जुड़े सूत्रों की पड़ताल की। एक-एक कड़ी जोड़ते हुए पूर्वांचल के विभिन्न क्षेत्रों में बिखरे रिश्तेदारों का पता लगाया गया।


इसके बाद बिछड़े रिश्तों को एक सूत्र में पिरोने के उद्देश्य से डेहरी गांव में भोजभात का आयोजन किया गया। पूर्वांचल की पारिवारिक परंपरा के अनुरूप नौशाद अहमद दुबे ने अपने उन रिश्तेदारों को भोज का निमंत्रण दिया, जिनके परिवार की शाखाएं सदियों पहले अलग हो गई थीं। निमंत्रण पाकर काशी और जौनपुर समेत विभिन्न स्थानों से परिवार के लोग डेहरी पहुंचे।


एक पंगत में बैठे तो मिट गईं सदियों की दूरियां


कुल मिलन समारोह का सबसे भावुक दृश्य उस समय सामने आया, जब ब्राह्मण परिवार के लोग एक पंगत में बैठकर भोजभात में शामिल हुए। नौशाद अहमद दुबे के परिवार के लोगों ने अपने रिश्तेदारों को भोजन परोसा। सदियों के अंतराल के बाद एक साथ बैठकर भोजन करने का दृश्य वहां मौजूद लोगों के लिए भावुक कर देने वाला था।


बड़कू हनुमान जी आश्रम के पीठाधीश्वर महंत प्रभु रामदास ने कहा कि खून और खानदान के रिश्ते पूजा-पद्धति के अंतर से समाप्त नहीं होते। उन्होंने नौशाद अहमद दुबे को परिवार का बड़ा मानते हुए उनके सम्मान और आदर की बात कही। उन्होंने कहा कि परिवार के बिछड़े लोगों का मिलना रिश्तों की उस डोर को फिर मजबूत करता है, जिसे समय और परिस्थितियां कमजोर नहीं कर सकीं।


“अब हम हिन्दू-मुसलमान नहीं, रिश्तेदार हैं”


महंत प्रभु रामदास ने कहा कि हम एक ही मां की संतान हैं। उन्होंने कहा कि आज ब्राह्मण परिवारों के खानदान मिले हैं और भावनाएं एक-दूसरे से जुड़ी हैं। उन्होंने इसे रिश्तों के पुनर्मिलन का अवसर बताते हुए कहा कि अब पहचान के बीच दूरी नहीं, बल्कि रिश्तेदारी का भाव है।


कुटुंब प्रबोधन के क्षेत्रीय संयोजक डॉ. शुकदेव त्रिपाठी ने कहा कि परिस्थितियां परिवारों को अलग कर सकती हैं, लेकिन पूर्वजों की कड़ियां और पारिवारिक परंपराएं लोगों को फिर जोड़ सकती हैं। इतिहास की घटनाओं ने भले ही परिवार को अलग-अलग कर दिया हो, लेकिन सभी की जड़ें एक ही पूर्वजों से जुड़ी हैं।


गौशाला का उद्घाटन, पूर्वज के नाम मार्ग का अवलोकन


कुल मिलन कार्यक्रम के साक्षी नई दिल्ली से आए आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारक एवं केंद्रीय अधिकारी विजय शर्मा भी बने। उन्हें नौशाद अहमद दुबे ने कार्यक्रम में आमंत्रित किया था। विजय शर्मा ने नौशाद दुबे के गोत्र के नाम पर स्थापित श्री वत्स गौशाला का उद्घाटन किया। इसके साथ ही उन्होंने नौशाद दुबे के पूर्वज के नाम पर बने लाल बहादुर दुबे मार्ग का भी अवलोकन किया।


विशाल भारत संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. राजीव श्रीगुरु ने कहा कि बिछड़े खानदान के लोगों का यह मिलन परिवार की जड़ों से जुड़ने का उदाहरण है। उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति अपनी जड़ों की तलाश करता है तो कई बिछड़े रिश्तों की कड़ियां सामने आती हैं। उनके अनुसार संस्थान ऐसे परिवारों के इतिहास और रिश्तों की खोज का प्रयास आगे भी जारी रखेगा।


कार्यक्रम का संचालन डॉ. अर्चना भारतवंशी ने किया, जबकि आभार नौशाद अहमद दुबे ने व्यक्त किया।


कुल मिलन समारोह में मो. आजम दुबे, अल्लाउद्दीन तिवारी, सादिक पांडेय, अशरफ दुबे, उमर दुबे, अब्दुल्ला दुबे, हिसामुद्दीन दुबे, ओबैदुर्रहमान, ओबैदुल्ला दुबे, अंसार तिवारी, विवेक मिश्र, अखिलेश शुक्ल, सुधीर मिश्रा, आकाश मिश्रा, प्रमोद त्रिपाठी, शैलेन्द्र कुमार शुक्ल, सत्यप्रकाश तिवारी, शानू पाठक, दीपक मिश्रा, अनुज त्रिपाठी, निरंजन दुबे, चंद्रभूषण गिरी, पुनीत पांडेय, अभय मिश्रा समेत बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।


डेहरी में शनिवार को केवल एक परिवार का मिलन नहीं हुआ, बल्कि सदियों से बिखरी रिश्तों की स्मृतियों को एक साथ बैठने का अवसर मिला। 357 वर्षों के अंतराल के बाद हुई यह मुलाकात उपस्थित लोगों के लिए लंबे समय तक याद रहने वाली भावुक स्मृति बन गई।

Related

JAUNPUR 8082852766125783008

एक टिप्पणी भेजें

emo-but-icon

AD

जौनपुर का पहला ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल

आज की खबरे

साप्ताहिक

सुझाव

संचालक,राजेश श्रीवास्तव ,रिपोर्टर एनडी टीवी जौनपुर,9415255371

जौनपुर के ऐतिहासिक स्थल

item