मिट्टी में गढ़ रहे आस्था के रंग, छह महीने की मेहनत से सजेंगी मां दुर्गा की प्रतिमाएं

 

जौनपुर। नवरात्रि की आहट के साथ ही दुर्गा पूजा पंडालों की तैयारियां तेज हो गई हैं। कहीं पंडालों को अंतिम रूप दिया जा रहा है तो कहीं मां दुर्गा समेत देवी-देवताओं की प्रतिमाओं में प्राण फूंकने के लिए मूर्तिकार दिन-रात जुटे हैं। शाहगंज-जौनपुर मुख्य मार्ग पर बारां मोड़ के पास मिट्टी के ढेर अब धीरे-धीरे आस्था के स्वरूप में बदल रहे हैं। मूर्तिकारों की उंगलियां मिट्टी को आकार देकर श्रद्धालुओं की भावनाओं को साकार करने में जुटी हैं। इनके लिए प्रतिमा निर्माण महज रोजी-रोटी का जरिया नहीं, बल्कि श्रद्धा और साधना का काम भी है।


खेतासराय सराय में करीब तीन दशक से दुर्गा प्रतिमाएं बनाने की परंपरा चली आ रही है। कलकत्ता से आए मूर्तिकार उत्तम पाल बताते हैं कि बचपन से ही वह प्रतिमाएं बनाने का काम कर रहे हैं। हर वर्ष करीब छह माह पहले खेतासराय पहुंचकर अपनी टीम के साथ प्रतिमाओं को आकार देने में जुट जाते हैं। इस वर्ष उन्हें 52 प्रतिमाओं का आर्डर मिला है और सभी की बुकिंग पूरी हो चुकी है।


उत्तम पाल के मुताबिक एक प्रतिमा तैयार होने में कई महीने की मेहनत लगती है। मिट्टी तैयार करने से लेकर ढांचा बनाने, आकार देने, रंग-रोगन और सजावट तक हर चरण में कलाकारों को बारीकी से काम करना पड़ता है। इस दौरान केवल प्रतिमा की सुंदरता ही नहीं, बल्कि देवी-देवताओं के स्वरूप और धार्मिक मान्यताओं का भी विशेष ध्यान रखा जाता है।


आठ फीट की मां काली रहेंगी आकर्षण का केंद्र


इस बार आठ फीट ऊंची मां काली की प्रतिमा विशेष आकर्षण का केंद्र रहेगी। प्रतिमा में भगवान शिव को नीचे लेटे हुए और मां काली को उनके ऊपर पैर रखे हुए स्वरूप में तैयार किया जा रहा है। प्रतिमा के निर्माण में कलाकार धार्मिक भावनाओं के साथ-साथ स्वरूप की बारीकियों का भी विशेष ध्यान रख रहे हैं।


मूर्तिकारों की पांच सदस्यीय टीम मार्च माह में ही यहां पहुंच गई थी। करीब छह महीने से लगातार चल रही मेहनत के बाद अब प्रतिमाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है। टीम में सुभोजित पाल, सुरजीत पाल, मोंगल बग्धी और मिलोन बग्धी शामिल हैं। सभी कलाकार प्रतिमा निर्माण के अलग-अलग कार्यों की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।


मूर्तिकार सुबोध पाल बताते हैं कि प्रतिमा निर्माण के लिए उपयुक्त मिट्टी तलाशना भी किसी चुनौती से कम नहीं है। कई जरूरी सामग्री वे कलकत्ता से साथ लेकर आते हैं। महीनों की मेहनत के बाद जब प्रतिमा तैयार होकर पंडाल में पहुंचती है और श्रद्धालु मां के दर्शन कर भाव-विभोर होते हैं, तो कलाकारों को अपनी मेहनत सफल होने का एहसास होता है।


मिट्टी को मां का स्वरूप देने वाले इन कलाकारों की यही साधना हर वर्ष नवरात्र में श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनती है।

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