“तू है राणा का वंशज, फेंक भाला जहां तक जाए”...बांस के भाले से शुरू हुआ सफर, एशियाई खेलों में कांस्य तक पहुंचा रोहित

पिता ने बांस का ऊपरी हिस्सा काटकर बनाया था पहला भाला, बेटे ने उसी से बुनी कामयाबी की कहानी

जौनपुर। “तू है राणा का वंशज, फेंक भाला जहां तक जाए...” इन पंक्तियों में छिपा हौसला अगर किसी खिलाड़ी की जिंदगी में उतर जाए तो साधारण सा भाला भी इतिहास रच सकता है। मछलीशहर तहसील के अदारी डिभिया गांव निवासी भाला फेंक खिलाड़ी रोहित यादव की कहानी कुछ ऐसी ही है। कभी गांव में पिता ने बांस के ऊपरी हिस्से को काटकर बेटे के लिए पहला भाला तैयार किया था। संसाधन सीमित थे, लेकिन हौसले की कोई सीमा नहीं थी। उसी बांस के भाले से शुरू हुआ अभ्यास आज एशियाई खेलों के कांस्य पदक तक पहुंच चुका है।


एशियाई खेल-2026 की पुरुष भाला फेंक स्पर्धा में कांस्य पदक जीतकर जनपद का नाम रोशन करने वाले रोहित यादव और उनके पिता सभाजीत यादव को रविवार को जिलाधिकारी सैमुअल पाल एन. ने जनसुनवाई कक्ष में सम्मानित किया। जिलाधिकारी ने दोनों को अंगवस्त्र, पुष्पगुच्छ और पुस्तक भेंट कर उपलब्धि पर बधाई दी।


बेटे के हाथ में भाला था, पिता के दिल में सपना


रोहित की सफलता के पीछे उनके पिता सभाजीत यादव का संघर्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जब महंगा और बेहतर भाला खरीदना आसान नहीं था, तब पिता ने गांव में उपलब्ध बांस से ही बेटे के लिए भाला तैयार कर दिया। उसी से रोहित ने शुरुआती अभ्यास किया। सुविधाओं का अभाव उनके कदम रोक नहीं सका। गांव की पगडंडियों और सीमित संसाधनों के बीच शुरू हुई मेहनत धीरे-धीरे बड़े मैदानों तक पहुंचती गई।


रोहित बताते हैं कि उनके पिता ने शुरुआती दौर में हर संभव तरीके से उनका साथ दिया। वह भाला फेंकते रहे और पिता उनके हौसले को मजबूत करते रहे। यही साथ उनकी खेल यात्रा की सबसे बड़ी ताकत बना।


2019 में पटियाला ने बदली दिशा


लगातार अभ्यास और बेहतर प्रदर्शन के बल पर वर्ष 2019 में रोहित यादव ने नेशनल कैंप, पटियाला से जुड़कर अपने खेल करियर को नई दिशा दी। इसके बाद प्रशिक्षण, प्रतियोगिताओं और लगातार अभ्यास ने उनकी प्रतिभा को निखारा। संघर्ष की सीढ़ियां चढ़ते हुए रोहित ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई और अब एशियाई खेलों में कांस्य पदक जीतकर जौनपुर के खेल इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया है।


डीएम ने कहा-रोहित की सफलता युवाओं के लिए प्रेरणा


जिलाधिकारी सैमुअल पाल एन. ने कहा कि रोहित की उपलब्धि उनके परिश्रम, लगन और निरंतर अभ्यास का परिणाम है। सीमित संसाधनों के बावजूद उनके पिता ने जिस तरह शुरुआती दौर में बेटे को अभ्यास के लिए सहयोग दिया, वह भी प्रेरणादायी है। रोहित की सफलता जनपद के दूसरे युवाओं को खेल के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेगी।


जिलाधिकारी ने कहा कि जिले में खेल प्रतिभाओं को शुरुआती स्तर पर चिन्हित कर उन्हें आवश्यक अवसर और सुविधाएं उपलब्ध कराने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में विकसित किए जा रहे मिनी स्टेडियम युवाओं को स्थानीय स्तर पर अभ्यास और अपनी प्रतिभा निखारने का अवसर देंगे। उन्होंने अधिकारियों को खेल प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने और उपलब्ध संसाधनों का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।


अब निशाना ओलंपिक के स्वर्ण पर


एशियाई खेलों का कांस्य पदक जीतने के बाद रोहित की नजर अब इससे भी बड़े लक्ष्य पर है। उन्होंने अपनी सफलता का अनुभव साझा करते हुए कहा कि एशियाई खेलों में कांस्य पदक जीतना उनके पिता के सपने को पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उनका अगला लक्ष्य 2028 ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व करते हुए बेहतर प्रदर्शन करना है। उन्होंने भविष्य में अपने जिले और देश के लिए स्वर्ण पदक जीतने का संकल्प व्यक्त किया।


एक गांव से निकला यह खिलाड़ी आज देश के बड़े खेल मंच पर अपनी पहचान बना चुका है। जिस हाथ ने कभी बांस के साधारण भाले से अभ्यास शुरू किया था, उसी हाथ ने अब एशियाई खेलों का कांस्य थाम लिया है। रोहित की कहानी बताती है कि संसाधनों की कमी प्रतिभा को रोक सकती है, लेकिन मजबूत इरादे और लगातार मेहनत को नहीं।


पिता की मेहनत से बेटे की उड़ान तक


रोहित की उपलब्धि केवल एक पदक की कहानी नहीं, बल्कि पिता-पुत्र के उस रिश्ते की कहानी है, जिसमें पिता ने साधन कम होने के बावजूद बेटे के सपने को बड़ा होने दिया। बांस के एक साधारण भाले से शुरू हुआ सफर एशियाई खेलों के पदक तक पहुंचा है। अब इस भाले की अगली उड़ान 2028 ओलंपिक की ओर है।


इस अवसर पर जिला क्रीड़ा अधिकारी अशोक सोनकर, एथलेटिक्स कोच कृष्ण यादव, कुश्ती कोच अशोक सोनकर, हैंडबॉल कोच निलेश यादव सहित अन्य प्रशिक्षक मौजूद रहे।

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