कविता में गूंजी माटी की पीड़ा, देर रात तक तालियों से सराबोर रहा सभागार
पूर्व गृह राज्यमंत्री कृपा शंकर सिंह ने कविता में पिरोई प्रवासियों की वेदना, गिरीश चंद्र यादव ने पत्रकारिता और साहित्य को बताया समाज का दर्पण
जौनपुर। गांधी और शास्त्री जयंती की संध्या पर जौनपुर की धरती साहित्य के सुरों से झंकृत हो उठी। शहर के प्रतिष्ठित होटल रिवर-व्यू के सभागार में जौनपुर प्रेस क्लब के तत्वावधान में आयोजित राष्ट्रीय कवि सम्मेलन एवं सम्मान समारोह में कविता ने संवेदनाओं को स्वर दिया तो शब्दों ने समाज की तस्वीर उकेरी। देर रात तक चले इस साहित्यिक अनुष्ठान में हास्य-व्यंग्य, वीर रस, देशभक्ति और सामाजिक सरोकारों से ओत-प्रोत रचनाओं ने श्रोताओं को कभी गुदगुदाया तो कभी भावुक कर दिया। हर प्रभावशाली प्रस्तुति पर तालियों की गड़गड़ाहट सभागार में देर तक गूंजती रही।
दीप प्रज्वलन के साथ आरंभ हुए समारोह में जनप्रतिनिधियों, साहित्यकारों, पत्रकारों, समाजसेवियों और गणमान्य नागरिकों की मौजूदगी ने आयोजन की गरिमा बढ़ाई। मंच पर साहित्य और पत्रकारिता का ऐसा संगम दिखाई दिया, जहां कलम ने समाज के सरोकारों को स्वर दिया और कविता ने मन के भीतर छिपी संवेदनाओं को शब्दों में ढाल दिया।
महाराष्ट्र के पूर्व गृह राज्यमंत्री एवं भाजपा के वरिष्ठ नेता कृपा शंकर सिंह ने प्रवासी जीवन की पीड़ा को अपनी काव्यात्मक अभिव्यक्ति में पिरोया। उन्होंने कहा कि रोजगार और बेहतर भविष्य की तलाश में इंसान भले ही देश-दुनिया के किसी भी कोने में पहुंच जाए, लेकिन उसकी माटी, परिवार और जन्मभूमि की स्मृतियां उसके हृदय में हमेशा जीवित रहती हैं। प्रवासियों के संघर्ष और अपनी जन्मभूमि के प्रति दायित्व का उल्लेख करते हुए उन्होंने अपनी रचनाएं सुनाईं तो सभागार भावनाओं से भर उठा। उनकी काव्य प्रस्तुति पर देर तक तालियां बजती रहीं।
उन्होंने कहा कि माटी का ऋण केवल स्मृतियों में संजोकर नहीं, बल्कि अपनी जन्मभूमि, समाज और क्षेत्र के विकास में योगदान देकर भी चुकाया जा सकता है। उनके शब्दों में प्रवासी मन की कसक, अपनी धरती के प्रति आत्मीयता और समाज के प्रति जिम्मेदारी एक साथ दिखाई दी।
उत्तर प्रदेश सरकार के खेल एवं युवा कल्याण राज्यमंत्री गिरीश चंद्र यादव ने साहित्य और पत्रकारिता को समाज का दर्पण बताते हुए कहा कि साहित्य समाज की संवेदनाओं को जगाने का काम करता है, जबकि पत्रकारिता जनसरोकारों को मजबूती से सामने लाती है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में पत्रकार समाज को जागरूक करने और उसकी आवाज को मंच प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने जौनपुर प्रेस क्लब के साहित्य और पत्रकारिता के इस सुंदर संगम की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन सामाजिक संवाद और सांस्कृतिक चेतना को नई ऊर्जा प्रदान करते हैं।
भाजपा नेता एवं समाजसेवी ज्ञान प्रकाश सिंह ने जौनपुर की साहित्यिक परंपरा को नमन करते हुए कहा कि यह धरती साहित्य, कला और संस्कृति की समृद्ध विरासत के लिए विख्यात है। ऐसे आयोजन रचनाकारों को मंच देने के साथ नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, संस्कृति और विरासत से जोड़ने का कार्य करते हैं। उन्होंने जौनपुर प्रेस क्लब के प्रयास की सराहना करते हुए आयोजन की सफलता के लिए पदाधिकारियों को बधाई दी।
राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में राजधानी लखनऊ से आए अतुल बाजपेयी, प्रयागराज से व्यंग्यकार अखिलेश द्विवेदी, प्रतापगढ़ से कवयित्री प्रीति पांडेय, स्थानीय कवयित्री विभा तिवारी तथा राष्ट्रीय कवि डॉ. प्रमोद वाचस्पति ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। किसी रचना ने देशप्रेम की लौ प्रज्ज्वलित की तो किसी ने सामाजिक विसंगतियों पर व्यंग्य के तीर चलाए। हास्य की फुहारों के बीच गंभीर सामाजिक सरोकारों ने श्रोताओं को आत्ममंथन के लिए भी विवश किया।
समारोह में पूर्व सांसद, विधायक, सामाजिक कार्यकर्ता, वरिष्ठ पत्रकार और विभिन्न संगठनों के पदाधिकारी मंचासीन रहे। सभी ने जौनपुर प्रेस क्लब के इस आयोजन को साहित्य और समाज के बीच संवाद का सशक्त माध्यम बताते हुए आयोजकों को शुभकामनाएं दीं।
आयोजन की सफलता पर जौनपुर प्रेस क्लब के अध्यक्ष शम्भू सिंह सोलंकी, महामंत्री वीरेंद्र प्रताप सिंह, संरक्षक राकेश कांत पांडेय, शेषनाथ सिंह एडवोकेट, उपाध्यक्ष लक्ष्मी नारायण यादव एवं कुंवर दीपक सिंह, दीपक श्रीवास्तव, वरिष्ठ पदाधिकारी शीतला प्रसाद मौर्य, लक्ष्मी मौर्य, शशिकांत मौर्य, सरस सिंह सहित सभी पदाधिकारियों को बधाई दी गई।
कुल मिलाकर गांधी-शास्त्री जयंती की यह शाम जौनपुर के सांस्कृतिक इतिहास में शब्दों, संवेदनाओं और सुरों की यादगार शाम बनकर उभरी। जब अंतिम प्रस्तुति के बाद भी तालियों की गूंज थमने का नाम नहीं ले रही थी, तब ऐसा लग रहा था मानो कविता ने सिर्फ सभागार ही नहीं, बल्कि जौनपुर की माटी के मन को भी छू लिया हो।

