सपा सरकार में यूपी पुलिस का हो रहा है यादवीकरण!
https://www.shirazehind.com/2014/06/blog-post_1238.html
लखनऊ. बदायूं गैंगरेप की घटना में जिन पुलिसवालों पर आरोप लगा है, वे यादव जाति से संबंध रखते हैं। इसके अलावा यूपी में ज्यादातर जिलों में देखें तो यही लगता है कि सपा सरकार के सत्ता में आते ही थानों में यादव जाति के अफसरों का वर्चस्व हो जाता है। ऐसे में प्रदेश में एक नई बहस छिड़ गई है कि क्या यूपी पुलिस का राजनीतिकरण या यादवीकरण किया जा रहा है।
खास बात यह है कि ये अफसर अपने सीनियर को भी कुछ नहीं समझते हैं। ये अफसर किसी न किसी तरह से यूपी के शीर्ष यादव राजनीतिक परिवार से लिंक निकाल ही लेते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि दूसरी जातियों के अफसरों में वह काबलियत नहीं है, जिससे सूबे की कानून-व्यवस्था पटरी पर आ सके।
बदायूं जिले की बात की जाए, जहां हाल ही में दो बहनों के साथ गैंगरेप की शर्मनाक घटना हुई है। इस जिले में कुल 22 थाने हैं। इनमें 16 थानों में यादव जाति के अफसर थानाध्यक्ष हैं। बदायूं से धर्मेंद्र यादव सांसद हैं। वह मुलायम सिंह यादव के भतीजे हैं। ऐसा नहीं है कि सिर्फ बदायूं का यह हाल है। गृह विभाग के सूत्रों के मुताबिक मुलायम परिवार से जुड़े जिलों के 60 फीसदी थानों में यादव जाति के अफसर थानाध्यक्ष हैं या सब इंस्पेक्टर के पद पर तैनात हैं। आंकड़े भी कुछ इसी ओर इशारा कर रहे हैं।
कन्नौज की सांसद मुलायम परिवार की बहू डिंपल यादव हैं। इस जिले में 9 थाने हैं। इनमें से 5 थानों में यादव थानाध्यक्ष हैं। मुलायम के गढ़ इटावा में 20 थानों में से 9 थानों में यादवों का कब्ज़ा है। वहीं, फर्रुखाबाद से अक्षय यादव सांसद है। यहां 14 में से 7 थानों में यादव अफसरों की पोस्टिंग हैं।
साथ ही राजधानी लखनऊ में 50 फीसदी थानों में यादव थानाध्यक्ष हैं।
कानपुर में 36 थानों में से 25 यादव थानेदार हैं। मेरठ में 27 में से 10
थानाध्यक्ष यादव है। बुलंदशहर में 27 में 9 और गाजियाबाद में 12 में से 6
थानेदार यादव जाति के हैं।
गौरतलब है कि मुलायम की पिछली सरकार में 2004 में 21 हजार सिपाहियों
की भर्ती की गई थी। बसपा सरकार आने पर एक ही जाति के लोगों की भर्ती को
लेकर इसे रद्द कर दिया था। 2012 में सपा सरकार के आने के बाद बसपा सरकार का
फैसला पलट दिया और सुप्रीमकोर्ट से एसएलपी को भी वापस ले लिया।
बदायूं की घटना ने सभी को सोचने को मजबूर कर दिया है कि आखिर सपा
सरकार कानून-व्यवस्था दुरुस्त करने में नाकाम क्यों हो रही है? ऐसे में इन
आंकड़ों को देख कर काफी हद तक स्थिति को समझा जा सकता है क्योंकि ऊंची पहुंच
वाले दारोगा के लिए तो यही सटीक बैठता है कि जब सैंया भए कोतवाल तो डर
काहे का।


तथ्यात्मक रिपोर्ट-सोनभद्र के २१ थानों में पुलिस इन्स्पेक्टर हैं -यहाँ अभी बदली के पहले यस पी ,ऐ एस पी और सीओ सभी यादव ही रहे हैं
जवाब देंहटाएं