गरीब छात्रों का सात अरब डकार गए शिक्षा माफिया , कार्रवाई से कतरा रहा समाज कल्याण विभाग

 लखनऊ। अनुसूचित जाति एवं जनजाति के विद्यार्थियों का फर्जी तरीके से कागजों पर प्रवेश दिखाकर सरकार के खजाने में अरबों की चपत लगाने वाले कॉलेजों पर आखिरकार दो वर्ष बाद ही सही, कार्रवाई शुरू की गई है। हालांकि समाज कल्याण विभाग अब भी दिग्गजों पर कार्रवाई की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। राजधानी के तो दो कॉलेजों के खिलाफ तत्कालीन जिलाधिकारी ने जांच कराने तक से हाथ खड़े कर दिए थे। ऐसे में समाज कल्याण विभाग की एकतरफा चाल से निष्पक्ष एवं पारदर्शी रूप से कार्रवाई हो पाना संभव होता नहीं दिख रहा।
उत्तर प्रदेश प्राविधिक विश्वविद्यालय (यूपीटीयू) से संबद्ध प्रदेश के इंजीनियरिंग एवं प्रबंधन संस्थान समेत कई शिक्षा के मंदिर पिछले कई वर्षो से सिर्फ एससी-एसटी छात्र-छात्राओं का हक मारकर पल रहे हैं। एससी-एसटी छात्र-छात्राओं के दसवीं या स्नातक की मार्कशीट का प्रयोग करके इंजीनियरिंग और एमबीए में कागजी प्रवेश दिया जाता रहा है। परीक्षा में छात्र शामिल नहीं हुए। कहीं 350 कॉलेजों में 280 अनुपस्थिति रहे तो कहीं 200 में 178 गायब।
 मामला खुलने पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने समाज कल्याण मंत्री के साथ बैठक की और इस मामले में कड़े कदम उठाने को कहा। इसके बाद प्रदेश में बड़े स्तर पर कार्रवाई शुरू हुई। राजधानी में सभी कॉलेजों की जांच के लिए मंत्री के आदेश पर तत्कालीन जिलाधिकारी अनुराग यादव ने महज औपचारिकता पूरी करने के लिए पूरा प्रशासनिक अमला लगा दिया। आखिरकार जांच की धीमी चाल ने पूरी कवायद पर ही ब्रेक लगा दिया। कई कॉलेजों की जांच में खानापूर्ति की गई तो कुछ की जांच ही नहीं की गई। मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। अब एक बार फिर समाज कल्याण विभाग के प्रयास से ही सही, लेकिन एक बड़े घोटाले पर कार्रवाई शुरू की गई है लेकिन दिग्गजों के खिलाफ कार्रवाई होती नहीं दिख रही है। हालांकि विभाग दावा कर रहा है कि अभी कार्रवाई की फेहरिस्त में 43 नाम हैं।
घोटाले का कारण
शिक्षण संस्थानों में छात्र-छात्राएं प्रवेश नहीं ले रहे थे। छात्र संख्या लगातार कम होने के कारण कॉलेजों ने कमाई का जरिया निकाल लिया। बीटेक में औसतन 80,000 और एमबीए में औसतन एक लाख रुपये फीस है। कॉलेज 80-90 फीसद अनुसूचित जाति वर्ग के अभ्यर्थियों का प्रवेश करने लगे क्योंकि इन छात्रों की पूरी फीस समाज कल्याण के जरिए कॉलेज को वापस आ जाती थी। एससी बच्चों के फर्जी दस्तावेज बनाकर प्रवेश दिए गए और समाज कल्याण विभाग से मोटी रकम इन बच्चों की फीस के रूप में ले ली गई।
यूं होता था घोटाला
कॉलेज प्रशासन दलालों को तैयार करता था। इन दलालों को एससी बाहुल्य इलाके में भेजा जाता। बीटेक में प्रवेश हेतु एससी छात्र-छात्राओं की इंटर की मार्कशीट 10,000 और एमबीए में प्रवेश हेतु स्नातक पास छात्रों की मार्कशीट 15,000 रुपये देकर खरीद लेते थे। यही मार्कशीट कॉलेजों को 20-25 हजार रुपये में बेच दी जाती थी। कॉलेज इन मार्कशीट के जरिए सिर्फ कॉगजों पर एससी विद्यार्थियों को प्रवेश दे देते थे और समाज कल्याण से फीस की रकम लेकर डकार जाते थे।
जल्द दर्ज होंगे मुकदमे
जिला समाज कल्याण अधिकारी केएस मिश्रा बताते हैं कि आरोपी कॉलेजों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। फिलहाल दो कॉलेजों पर एफआइआर दर्ज की गई है। जल्द ही बाकी कॉलेजों के खिलाफ भी एफआइआर करा दी जाएगी। 

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