अधूरा मूल्यांकन कर फेंक दिया कापियों का बंडल
https://www.shirazehind.com/2014/06/blog-post_7012.html
जौनपुर : वीर बहादुर सिंह पूर्वाचल विश्वविद्यालय के मूल्यांकन में
छात्रों के भविष्य के साथ जमकर खिलवाड़ हो रहा है। इसकी लापरवाही गुरुवार को
हिंदी के मूल्यांकन के दौरान केंद्रीय मूल्यांकन मैकेनिकल भवन में देखने
को मिली। जहां कमरा नंबर एक में समाजशास्त्र की उत्तर पुस्तिकाएं आधी-अधूरी
ही जांचकर फेंकी हुई मिली। कोने में पड़ा बंडल जब परीक्षकों ने देखा तब
जाकर मामला सामने आया।
कमरा नंबर एक में हिंदी का मूल्यांकन चल रहा था। उसी समय एक परीक्षक की नजर कोने में पड़े एक बंडल पर गई। जब लोगों ने उसे उठाकर देखा। इसके बाद फौरन मामले की जानकारी समन्वयक को दी गई। जब बंडल खोला गया तो 75 में से 20 ही कापियों का मूल्यांकन हुआ पाया गया। इसके बाद कापियों को सुरक्षित रख लिया गया है। कापियों के ऊपर शिक्षक का कोड 154 था। हस्ताक्षर का पहचान नहीं हो पा रहा था। शिक्षक का प्रपत्र भी बाबू के पास से गायब था।
इस बाबत समन्वयक डा.राममोहन सिंह ने बताया कि एक परीक्षक डिबार हो गया था। जिसकी चार-पांच ही कांपी जांची गई थी। कोई कापी फेंकी नहीं बल्कि सुरक्षित रखी गई थी। समन्वयक का यह तर्क लोगों के गले नहीं उतर रहा है। समाजशास्त्र का मूल्यांकन 18 को समाप्त कर हिंदी की कापियां जांची जा रही है तो वह कोठार या दूसरी जगह क्यों नहीं स्थानांतरित की गई। उल्टा हिंदी के परीक्षकों ने बंडल समन्वयक के पास पहुंचाया। अगर परीक्षक डिबार था तो उसी विषय के दूसरे परीक्षक से क्यों नहीं मूल्यांकन कराया गया। आरोप व तर्क में सच्चाई चाहे जितनी हो अगर कापियां इसी तरह छूटी रह जाती तो कितने छात्रों का भविष्य खतरे में पड़ जाता।
कमरा नंबर एक में हिंदी का मूल्यांकन चल रहा था। उसी समय एक परीक्षक की नजर कोने में पड़े एक बंडल पर गई। जब लोगों ने उसे उठाकर देखा। इसके बाद फौरन मामले की जानकारी समन्वयक को दी गई। जब बंडल खोला गया तो 75 में से 20 ही कापियों का मूल्यांकन हुआ पाया गया। इसके बाद कापियों को सुरक्षित रख लिया गया है। कापियों के ऊपर शिक्षक का कोड 154 था। हस्ताक्षर का पहचान नहीं हो पा रहा था। शिक्षक का प्रपत्र भी बाबू के पास से गायब था।
इस बाबत समन्वयक डा.राममोहन सिंह ने बताया कि एक परीक्षक डिबार हो गया था। जिसकी चार-पांच ही कांपी जांची गई थी। कोई कापी फेंकी नहीं बल्कि सुरक्षित रखी गई थी। समन्वयक का यह तर्क लोगों के गले नहीं उतर रहा है। समाजशास्त्र का मूल्यांकन 18 को समाप्त कर हिंदी की कापियां जांची जा रही है तो वह कोठार या दूसरी जगह क्यों नहीं स्थानांतरित की गई। उल्टा हिंदी के परीक्षकों ने बंडल समन्वयक के पास पहुंचाया। अगर परीक्षक डिबार था तो उसी विषय के दूसरे परीक्षक से क्यों नहीं मूल्यांकन कराया गया। आरोप व तर्क में सच्चाई चाहे जितनी हो अगर कापियां इसी तरह छूटी रह जाती तो कितने छात्रों का भविष्य खतरे में पड़ जाता।

