जेलों में बढ़ती कैदियों की बाढ़
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प्रभुनाथ शुक्ल
देश की सर्वोच्च अदालत की ओर से विचाराधीन कैदियों पर आया फैसला अहम है। कोई भी विचाराधीन कैदी अगर अपनी सजा का आधा समय जेल की सलाखों में गुजार चुका है तो अब उसे जेल की अंतहीन यातना नहीं सहनी पड़ेगी। सरकार ने इस फैसले पर गंभीरता से विचार किया तो इसका लाभ जल्द जेलों में बंद मानसिक पीड़ा झेल रहे कैदियों को मिलेगा। धारा 336 ए के तहत अदालत का यह आदेश मानवीय हितों और जेल की तकनीकी समस्याओं को देखते हुए आया है। बदलते वक्त के साथ अपराध की गति भी तीव्र होती दिखती है। जिससे अदालतों और जेलों पर जहां फैसलों और कैदियों को बोझ बढ़ रहा हैं वहीं सामाजिक ढांचा भी दरक रहा हैं। जेलों की सुरक्षा पर भी सवाल उठते हैं। निर्भया और यूपी के एनआरएचएम घोटाले में आरोपियों की मौते जेल की सलाखों में हो गयी। पाकिस्तान की जेल में बंद चर्चित सर्वजीत की मौत भी संदेहास्पद स्थिति में हुई थी। इस फैसले से जेलों में कैदियों की बाढ़ को कम किया जा सकता है। मानवीय अधिकारों और संवेदना के संदर्भ में इसका दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। आम तौर यह देखा गया है कि मामूली जुर्म में भी लोगों को जेलों में ठूंस दिया जाता है। जेल अपराराधी प्रवृत्ति के लोगों और दुर्दांत अपराधियों के लिए पनाहगार हो सकती हैं लेकिन आम कैदियों और साधारण जुर्म के आरोपियों के लिए जेलें किसी नरक यातना से कम नहीं होती हैं। आम तौर पर देखा गया है कि पुलिस असिमित अधिकारवाली आईपीसी की धारा 151 का भी दुरपयोग करती है। इस धारा में पुलिस निजी मुचलके पर भी आरोपियों को छोड़ सकती है लेकिन वह ऐसा नहीं करती है। समाज के प्रभावशाली लोगों की बेल तो इस धारा में तत्काल हो जाती है। लेकिन गरीब तबके के लोग कई महींने झेलने के बाद बाहर आते हैं उनकी कोई जमानत तक लेने को तैयार नहीं होता है। यह पुलिस और काननू का दोहरा नजरिया है जिससे जेलों पर अनावश्यक लोड बढ़ता है। देश में पुलिस केस की बढ़ती संख्या से कैदियों की आमद से जेल की व्यवस्था चरमराने लगी है। जिसका नतीजा है कि आए दिन जेलों में आरक्षियों की गैर मानवीय हरकतों, मारपीट, घटिया भोजन और जेलब्रेक की घटनाएं मीडिया की सूर्खियां बनती हैं। इसका असर कानून-व्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ता है। देश की 13 हजार से अधिक जेलों में 3 लाख 81 हजार कैदी बंद हैं। इसमें सजायाफता और विचाराधीन दोनों श्रेणियों के कैदी हैं। जबकि विचाराधीन कैदियों की संख्या 2 लाख 54 हजार है। वहीं उत्तर प्रदेश में कुल 37 हजार 827 कैदी हैं। हाल के आए सुप्रीमकोर्ट के आदेश में कहा गया है कि जेलों में बंद जिन विचाराधीन कैदियों ने अपनी सजा का आधा वक्त काट लिया है उन्हें रिहा कर दिया जाय। इस फैसले से यूपी की जेलों में बंद 20 हजार से अधिक कैदियों को लाभ मितलेगा। अदालती फैसले के बाद अगर केंद्र सरकार इस पर गंभीरता से विचार करती है तो एक लाख से अधिक कैदियों को जेल की जिल्लत से मुक्ति मिल जाएगी। अगर ऐसा संभव हुआ और सरकार की संवेदना जागी तो निश्चित तौर पर यह एक उचित फैसला साबित होगा। इससे जहां लंबे वक्त से जेलों में बंद कैदियों को अपने गुनाह को सुधारने का वक्त मिलेगा। वहीं बाकि बची जिंदगी को वे अपनों के साथ खुशहाल बना सकते हैं। किसी कारण बस अगर उनके कदम अपराध की दुनिया में बहक गए होंगे वे इस फैसले से वापस लौट सकते हैं। आम तौर पर देखा गया है कि देश की अदालतों और जेलों में ऐसे हजारों बेगुनाह हैं जिनका कोई जुर्म नहीं है लेकिन वे साक्ष्य के अभाव में सजा काट रहे हैं। यह फैसला उनकी जिंदगी में नयी सुबह लेकर आएगा। कितने ऐसे बेगुनाह कैदी होंगे जिनके सपने ही टूट गए होंगे। किसी की पूरी की पूरी जिंदगी जेल की सलाखों में खप जाती है। लेकिन अदालत का यह फैसला हजारों परिवारों के लिए शकून देने वाला है। इस फैसले पर सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए। जिससे पुलिस का कानूनी डंडा किसी बेगुनाह पर न बरसे। अदालतों पर अनावश्यक बोझ न बढ़े इसके लिए पुलिस, अदालतें और सरकारों को मिल कर काम करना होगा। आमतौर पर देखा गया है कि किसी हाईप्रोफाइल मामले में पुलिस राजनीतिक दबाव के चलते निर्दोष व्यक्ति को जेल की सलाखों तक पहुंचा देती है। अदालत भी आईपीसी की धाराओं की संगीनता को देखते हुए उसे अदालती पेशी के बाद जेल में भेज देती है। अगर पहली पेशी के दौरान अदालत गंभीरता से विचार करे तो अधिकांश बेगुनाह जेल की अंतहीन यातना और जिल्लत से बच सकते हैं। उनका परिवार और उनके सपने टूटने और विखरने से बच सकते हैं लेकिन ऐसा नहीं होता है। हाल में यूपी के बदायूं में दो चचेरी बहनों के बलात्कार कांड में कानून का चेहरा बेनकाब होता दिखा। आखिरकार सीबीआई जेल में बंद आरोपियों को निर्दोष बता दिया। बलात्कार की पुष्टि नहीं हो सकी। लाई डिटेक्टर से भी कुछ हासिल नहीं हुआ। ऐसी स्थिति में सवाल उठता है कि उन्हें आरोपी क्यों बनाया गया। उन्हें अनावश्यक जेल की यातना सहनी पड़ी। उनकी सामाजिक छबि प्रभावित हुई। इन सबके लिए कौन जिम्मेदार है। देश का सबसे होईप्रोफाइल कांड आरुषी मर्डर केस में भी सीबीआई जैसी संस्था कई बार की जांच के बाद भी इस नजीजे पर नहीं पहुंची सकी कि आरुषी की हत्या का असली मुल्जिम कौन है ? कई मामलों में या हमारे आसपास यह अक्सर देखने को मिलता है कि पुलिस राजनीतिक प्रेसर या अपनी खुद की नाक बचाने के चक्कर में किसी गैर अपराधी को फांस कर जेल भेज देती है। इसके बाद बड़ी अदालातों में तारीख पर तारीखें पड़ती हैं लेकिन फैसलों में त्वरितगति नहीं दिखती है। कई कई मामलों में सालों साल फाइलें अदालती मेरिट पर नहीं आते हैं। जिससे जिंदगी की बची खुची आस भी समाप्त हो जाती है। इसके लिए अदालतों में पर्याप्त जजों की नियुक्ति और फास्ट टैक कोर्ट की स्थापना जरुरी है। लेकिन उतना ही सबसे पहले पुलस का पारदर्शी होना है। महज आरोप लगाने से किसी व्यक्तिा को जेल भेजना उसके मानवीयहितों के खिलाफ है। 60 फीसदी मामलों में बेमतलब लोगों की गिरफतारी होती है। पुलिस कई मामलों में खुद निजी मुचलके पर आरोपी को छोड़ सकती है लेकिन वह ऐसा नहीं करती है। नक्सल प्रभावित इलाकों में इस तरह की वारदातें आम बात है। बदले दार में क्रिमिनल ला में सुधार की जरुरत है। जेलों में कैदियों के अधिकारों के लिए जेल सुधार व निगरानी आयोग का भी गठन होना चाहिए जो कैदियों के मानवीय अधिकारों की समय-सयम पर समीक्षा करे। अगर खामिया मिलती हैं तो इसके लिए जेल अफसरों को दंडि़त किया जाना चाहिए। गरीब और पीडि़त लोगों के लिए अदालतों में कानूनी सेल की स्थापना भी की गयी है लेकिन किसी को यह सहायता नहीं मिल पाती है। अधिकांश गरीब व पीडि़त व्यक्तियों को यह पता ही नहीं होता है कि उनकी कानूनी सहायता के लिए अदालतों में सेल भी गठित है। इसका बेजा लाभ कालीकोट वाले उठाते हैं। एक बार कोई अदालती दरवाजे तक पहुंच गया तो उसका सिलसिल फिर थमता नहीं है। यह भी देखा गया है कि अदालतों की ओर से कभी-कभी बेल के लिए भारी भरकम बेलबांड भरना भी अनिवार्य होता है। जबकि आरोपी की हैसियत उतनी नहीं होती है इस स्थिति में जेल से बाहर आने की उसकी उम्मीदों पर पानी फिर जाता है। यूपीए सरकार में यह मसला सामने आया था। तीन से अधिक तारीखें न लगें और अधिवक्ताओं का इस्तेमाल कम होना चाहिए। बाद में उस पर गंभीरता नहीं दिखायी गयी। फिलहाल अदालत की ओर से आए इस फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए। इस पर सरकार को संवेदनशीलता से सोचना चाहिए। जिससे आम कैदियों और दूसरे लोगों के अधिकारों की रक्षा हो सके। आधी सजा काट चुके लोगों की अगर रिहाई होती है तो इससे देश की जेलों में बंद एक लाख से अधिक लोगों को लाभ मिलेगा। वहीं उत्तर प्रदेश की जेलों में बंद कम से कम 20 हजार विचाराधीन कैदी जेल की जिल्लत भरी चाहारदीवारी से बाहर आकर खुली हवा में बाकि जिंदगी गुजार सकेंगे। वहीं जेलों में लगातार बढ़ती कैदियों की आमद को रोका जा सकता है। देश की सर्वोच्च अदालत का यह फैसला कई मायनों में अहम है।
लेखकः स्वतंत्र पत्रकार हैं

