तुम कस्तूरी केश न खोलो सारी रात मॅहक जायेगी .........

 जौनपुर। साहित्य वाचस्पति, साहित्य महारथी, साहित्यभूषण तथा मधुलिमये पुरस्कार¨ एवं उपाधिय से विभूषित डा. श्रीपाल सिंह क्षेम का जन्म  सितम्बर 1922 में जनपद मुख्यालय से लगग 10 किलोमीटर पश्चिम बशारतपुर गांव में हुआ था। गांव की मिट्टी  में पले-बढ़े  क्षेम  जी ने प्राथमिक शिक्षा ग्रामीण विद्यालय से प्राथमिक  की। माध्यमिक शिक्षा जौनपुर से प्राप्त  करने के  उपरान्त उन्होने उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्रा की। उन दिनो  प्रयाग साहित्यकारो के संगम के  रुप में जाना जाता था। साहित्यकारो  द्वारा गठित ‘परिमल’ संस्था में डा. धर्मवीर भारती, डा जगदीश गु जैसे दिग्गज साहित्यकारो  के बीच क्षेम जी ने जौनपुर की मिट्टी की  पहचान दी। साहित्य के  क्षेत्र में नयी कविता के आगमन के  बाद गीतो  की उपेक्षा हो ने लगी थी, लेकिन इन झंझावातो  के  बीच डा. शम्भूनाथ एवं डा. क्षे जैसे गीतकारो  ने गीत को  साहित्य में स्थापित करने का अनिर्वचनीय प्रयास किया।
पूर्वान्चल के  कवि सम्मेलनो  में तो  मंच पर डा. क्षेम  की उपस्थिति ही कार्यक्रम की सफलता की गारण्टी हुआ करती थी। उनको  हृदय-स्पर्शी गीत आज भी लोगो  के  होठो पर गूंजते हैं। ‘एक पल ही जिय¨, फूल बनकर जिय¨, शूल बनकर ठहरना नहीं जिन्दगीं,’ जैसे गीत हमें मानवता के  पथ पर अग्रसर होने की प्रेरणा देते है। डा. क्षेम विषम परिस्थितियो  में भी हमें निराश न ह¨ने की प्रेरणा देते हैं। उनकी पंक्तियां पा व में हो  थकन, अश्रु भीगे नयन, राह सूनी मगर गुनगुनाते चले  उलेखनीय हैं। डा. तुम कस्तूरी केश न खोलो  सारी रात मॅहक जायेगी के  रचनाओ  में रस-राज श्रृंगार की अद्भुत छटा देखने क¨ मिलती है। ‘मन की नींद बहक जायेगी, सोयी आग दहक जायेंगी’, तुम कस्तूरी केश न खोल¨ सारी रात मॅक जायेगी , जैसे रचनाए सहृदय श्रोताओ और  पाठको  के  चित्त से कभी विस्मृत नहीं ह¨ती।
क्षेम जी अपने जीवन में सबहि सुलभ सब दन सब राती पंक्ति को साकार करते रहे किसी जनप्रतिनिधि के दरवाजे की तरह उनके दरवाजे पर भी पीडित शोषित लोग न्याय की आशा लिए आते रहते थे क्षेम जी ने उन्हे कभी निराश नही किया तिलकधारी महाविद्यालय में  हिन्दी विभाग के अध्यक्ष पद से सेवानिवृत होने के बाद उन्होंने विकलांग की समस्याओ के निराकरण हेतु अस्थि विशेषज्ञ डा पीपी दुबे के सहयोग से विकलांग पुनर्वास केन्द्र कर स्थापना की
डा क्षेम यद्यपि सशरीर हमारे बीच नही है किन्तु उनका यश रूपी शरीर आज भी अजर और अमर है कहा भी गया है जयन्ति ते सुकृतिनो रस सिद्वा कवीरश्वराःनास्ति यशःकाये जरा मरण जम् भयम्।

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