कुछ याद उन्हे भी कर लो : जाबाज़ सैनिको ने देश के खातिर दिया बलिदान , नेताओ दिया कोरा आश्वासन
https://www.shirazehind.com/2015/08/blog-post_842.html
जौनपुर। न तन का न मन का है कोई ठिकाना, जहां भी रहूंगा बस मुझे याद रखना। कुछ ऐसा ही जज्बा दिखाया था जौनपुर जिले के 8 नौजवानों ने जिन्होंने कारगिल युद्ध के दौरान आपरेशन रक्षक में शामिल होकर न सिर्फ अपने प्राणों की आहूति दी, बल्कि अपने बलिदान से जौनपुर का नाम स्वर्ण अक्षरों में पूरी दुनिया में दर्ज करा दिया। अकेले केराकत तहसील के 6 जवानों ने कारगिल युद्ध में अपनी शहादत देकर केराकत का नाम भी पूरी दुनिया में रौशन कर दिया।
1999 में पड़ोसी देश पाकिस्तान ने जब कारगिल में धोखे से घुसपैठ कर कई इलाकों पर अपना कब्जा जमा लिया था तो भारतीय फौज ने आपरेशन रक्षक चलाकर दुश्मनों से जमकर लोहा लिया और अपनी जान को न्यौछावर कर न सिर्फ अपने इलाकों पर तिरंगा फहराया, बल्कि पूरी दुनिया में अपनी जाबाजी का किस्सा फैलाया। देश के सैकड़ों जवानों ने अपनी जान गवां कर कारगिल पर तिरंगा लहराया। उन्हीं जवानों में से 7 जवान जौनपुर जिले के थे जिनमें अकेले केराकत तहसील के 5 जवान थे जिन्होंने अपनी बहादुरी से न सिर्फ दुश्मनों के दांत खट्टे किये, बल्कि अपने बलिदान से पूरे केराकत तहसील का नाम रोशन कर दिया। अकबरपुर खान के लांस जगदीश सिंह, कुसरना गांव के धीरेन्द्र यादव तो नरहन के सेफर जावेद खान, नरकटा गांव के नायक शकील अहमद व मणिगांव के ग्रेनेडियर मनीष सिंह रघुवंशी ने दुश्मनों से जमकर लोहा लिया और सीने पर गोलियां खाकर न सिर्फ कारगिल पर तिरंगा लहराय, बल्कि अपनी शहादत देकर पूरे परिवार व गांव के लोगों का सम्मान बढ़ाया। जगदीश सिंह के परिवार वालों को उसकी कुर्बानी पर आज भी नाज है।
कुसरा गांव के धीरेन्द्र प्रताप यादव के परिवार वाले अपने लाडले को गवां कर आज भी गर्व महसूस कर रहे हैं। आज गांव का बच्चा-बच्चा धीरेन्द्र प्रताप यादव की तरह देश के लिये मर-मिटने को तैयार हो रहे हैं। नरहन गांव के सपूत जावेद खान की बात ही निराली थी। पिता यहाइया खान पहले से ही फौज में थे। परिवार के अन्य लोग भी देश की सेवा में लगे रहे। ऐसे में जावेद खान ने अपनी शहादत देकर न सिर्फ परिवार वालों का सर ऊंचा किया, बल्कि उनकी शहादत को आज भी लोग भूल नहीं पाये हैं। गांव वाले शहीद जावेद की मजार पर फातेहा पढ़ रहे हैं तो भाई को भी उस पर गर्व है। हालांकि कुछ मलाल भी रह गया। शादी के एक साल के अंदर जावेद की बीबी बेवा हो गयी और दादी आज भी उसे याद कर फर्क महसूस करती है।
कारगिल युद्ध के दौरान जिस तरह से शिराज-ए-हिन्द के इन वीर सपूतों ने दुश्मनों से लोहा लेते हुये अपनी जान देश पर न्यौछावर की है। उसे न सिर्फ केराकत तहसील बल्कि जिले के बच्चे-बच्चों में इनकी वीरता के कसीदे सुनाये जाते हैं। ऐसे वीर सपूतों को याद कर हमें भी उनके बलिदान को याद रखना चाहिये जिन्होंने देश की रक्षा की खातिर अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था।
28 मई 2002 को केराकत तहसील के जलालपुर थाना क्षेत्र के नेवादा गांव का जाबाज़ तेज़ बहादुर सिंह जम्मू कश्मीर में देश के दुश्मनो के साथ लड़ते लड़ते शहीद हो गया। 1 मई को वीर सपूत का शव उसके घर पहुंचा तो कोहराम मच गया था। अंतिम सलामी देने के लिए तत्कालीन यूपी के लघुउद्योग मंत्री जगदीश नारायण राय समेत कई नेता और अधिकारी गांव पहुंचे थे। सभी नेताओ ने शहीद एक मात्र पुत्र संतोष सिंह को सरकारी नौकरी देने का आश्वासन दिया था और उसकी पत्नी मीना सिंह से वादा किया कि गांव के स्कूल का नाम तेज बहादुर सिंह कर दिया जायेगा और घर तक रास्ता बनवाकर वह शहीद के नाम पर होगा। पुरे 13 वर्ष बीत जाने के बाद ना तो बेटे को नौकरी मिली ना सड़क बना न ही स्कूल पर शहीद तेज़ बहादुर का नाम लिखा गया।
आज शिराज़ ऐ हिन्द डॉट कॉम शहीद के घर पहुंचकर उसके पत्नी और बेटे से बात किया गया तो उनका जख्म फिर से हरा हो गया। माँ और बेटे को मंत्री जगदीश राय से काफी नाराजगी है। उनका आरोप है जिस दिन उनका पार्थिक शरीर गांव आया था उस दिन वे कई वादे किये थे लेकिन उनके किये वादो को पूरा कराने के लिए एक दर्जन बार हम माँ बेटे लखनऊ तक दौड़ लगाई लेकिन आज तक एक भी वादा पूरा नही हुआ।


