हमने उसके घर ही नहीं छीन लिए, उसकी मौत का इंतजाम भी कर दिया

 जौनपुर।  सुइथाकला विकास खंड के प्राथमिक विद्यालय जहुरुद्दीनपुर के शिक्षको ने छात्रों को जागरूक किया। बच्चों ने उनके लिये घर बनाये दाना चुगने के लिए डिब्बे बनाये, पानी पीने के लिए व्यवस्था किये। शिवम् सिंह, सुनीता व इसरावती जी ने बच्चों को प्रकृति प्रेमी बनने के लिए प्रेरित किया। 
नही चिरैया मेरी गौरैया कभी हमारे घर की नन्ही परी गौरैया कलरव करती थी मगर अब कम ही नजर आती है। दिखे भी कैसे, हमने उसके घर ही नहीं छीन लिए बल्कि उसकी मौत का इंतजाम भी कर दिया। हरियाली खत्म कर कंक्रीट के जंगल खड़े किए, खेतों में कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल कर उसका कुदरती भोजन खत्म कर दिया और अब मोबाइल टावरों से उनकी जान लेने पर तुले हुए हैं। गौरेया 25-30 साल पहले तक घर-परिवार का एक अहम हिस्सा थी। घर के आंगन में फुदकती गौरैया, उनके पीछे नन्हे-नन्हे कदमों से भागते बच्चे। अनाज साफ करती मां के पहलू में दुबक कर नन्हे परिंदों का दाना चुगना और और फिर फुर्र से उड़कर झरोखों में बैठ जाना। ये नजारे अब शहरों में ही नहीं गांवों में भी नहीं दिखाई देते। फसलों में कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से परिंदों की दुनिया ही उजड़ गई है। गौरैया का भोजन अनाज के दाने और मुलायम कीड़े हैं। गौरैया के चूजे तो केवल कीड़ों के लार्वा खाकर ही जीते हैं। कीटनाशकों से कीड़ों के लार्वा मर जाते हैं। ऐसे में चूजों के लिए तो भोजन ही खत्म हो गया है। गौरैया आम तौर पर पेड़ों पर अपने घोंसले बनाती है। पेड़-पौधे लगातार कम होते जा रहे हैं। यह घर के झरोखों में भी घोंसले बना लेती है। अब घरों में झरोखे ही नहीं तो गौरैया घोंसला कहां बनाए। मोबाइल टावर से निकलने वाली तरंगें, अनलेडेड पेट्रोल के इस्तेमाल से निकलने वाली जहरीली गैस भी गौरैयों और अन्य परिंदों के लिए जानलेवा साबित हो रही है। इन सबके बीच गौरैया के संरक्षण के लिए छिटपुट सराहनीय प्रयास भी हो रहे हैं। 
 शिवम् सिंह ने कुछ उपाय बताऐ जो निम्न हैं- -घरों में कुछ ऐसे झरोखे रखें, जहां गौरैया घोंसले बना सकें। -छत और आंगन पर अनाज के दाने बिखेरें। -आंगन और छतों पर पौधे लगाएं ताकि पक्षी आकर्षित हों। -फसलों में कीटनाशकों का प्रयोग न करें। -घर की मुंडेर पर मिट्टी के बरतन में पानी रखें। -अनलेडेड पेट्रोल का इस्तेमाल न करें।

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