मां की मेहनत की बदौलत बना डाक्टर: लालबहादुर सिध्दार्थ

संघर्षो में यदि कटता है तो कट जाये सारा जीवन , कदम कदम पे समझौता करना मेरे बस की बात नही।
कुछ ऐसा कहना है जौनपुर जिले के प्रख्यात चिकित्सक डा0 लालबहादुर सिध्दार्थ का। डा0 सिध्दार्थ आज जौनपुर ही नही पूर्वाचंल के माने जाने सर्जन के रूप में विख्यात है। इन्होने अब तक दर्जनो ऐसे आपरेशन करके मरीजो की जान बचायी है जिन्हे वाराणसी, लखनऊ और मुबंई तक के बड़े बड़े डाक्टरो ने जवाब दे दिया था। आज इनका शहर में एक अच्छा से अपना अस्पताल है प्रतिदिन एक सौ से लेकर दो सौ मरीजो का इलाज करते है करीब एक दर्जन आपरेशन करते है। कई मरीजो के दवा इलाज में आये एक से डेढ़ लाख रूपये भी माफ करके डाक्टरी पेशे को भगवान का दर्जा भी दिला चुके है।
आज डा0 लाल बहादुर सिध्दार्थ के पास शोहरत भी है और दौलत भी। आज हम आप लोगो को बताने जा रहे है डा0 सिध्दार्थ की पुरानी कहानी  
डा0 लाल बहादुर सिध्दार्थ का जन्म 20 अप्रैल 1967 को बक्शा ब्लाक के बसारतपुर गांव में एक दलित परिवार में हुआ था। उनके पिता शिव मूर्ति राम डाक विभाग में पोस्ट मास्टर रहे माता स्वर्गीय प्यारी देवी गांव के क्षत्रियों और ब्राहमणो का खेत बटायी पर लेकर खेती करती थी।  चार बहन है। ऐसे में सात परिवार वाले इस कुनबे को बा मुश्किल दो वख्त की रोटी नसीब हो पाती थी। बचपन से ही सिध्दार्थ प्रतिभावान छात्र रहे जिसके कारण उन्हे स्कूल के शिक्षक वेगैर किसी भेदभाव के पढ़ाते थे। स्कूल से आने बाद लालबहादुर पहले घर में खाना बनाने के लिए बगीचो में जाकर लकडि़यां एकत्रीत करके घर  लौटते थे उसके बाद पढ़ाई करते थे। डा0 प्राथमिक शिक्षा गांव की स्कूल से लेने के बाद वे हाई स्कूल शम्भूगंज इण्टर कालेज से करने बाद इण्टर करने के लिए जौनपुर शहर के  बंशीधर राष्ट्रीय पाठशाला बीआरपी मंे दाखिला लिया। गरीबी और मुफिलिसी के दौर से गुजने के बाद भी लालबहादुर ने कालेज में टाॅप किया। उसके बाद टीडी कालेज में बीएससी दाखिला लिया करीब एक महीने के बाद  सीपीएमटी प्रवेश परीक्षा 1988 का रिजल्ट   गया इस परीक्षा परिणाम लालबहादुर 36 वीं रैंक आया  वे  झांसी  मेडिकल कालेज से एमबीबीएस की  डिग्री हासिल करने के बाद मास्टर आॅफ सर्जरी एमएस इलाहाबाद मेडिकल कालेज से किया। उसके बाद डा0 लालबहादुर दिल्ली जाकर वर्धमान महावीर मेडिकल कालेज  सफदरगंज हास्पिटल में कार्यभार सम्भाल लिया। वहा पर कई वर्षो तक मरीजो  की सेवा करने के साथ ही कई मेजर आपरेशन किया। इसी बीच उन्होने एक मरीज  के पेट आपरेशन करके  देश में ही नही विदेशो में तहलका मचा दिया। यह रिसर्च विश्व की फेमस सर्जरी की मैगजीन में छापा गया यह मेरे विभाग के लिए गर्व की बात रही। डा0 सिध्दार्थ ने बताया कि यह ऐसा आपरेशन था कि जिसे अपने देश के जाने माने डाक्टर की  दूर की बात विदेश के डाक्टरो ने आपरेशन करने  से इंकार कर दिया था। इस आपरेशन की सफलता के डा0 सिध्दार्थ खुद को अपने ऊपर भरोषा होने के बाद  वे अपने जिले का कर्ज उतारने के  नियत से दिल्ली की हाई प्रोफाईल सोसाईट को छोड़कर जौनपुर गये।  उसके बाद जब मै वहां से अपने जिले में जाने के लिए सोचा तो मेरे सहपाठी डाक्टरो ने कहा कि लोग यहां से विदेश जाने के लिए सोचते है या फिर दिल्ली में रहने की बात करते है तो तुम क्यो गांव जाने की योजना बना रहे हो। मैने उनको जवाब दिया कि बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर विदेश अपने अपने देश लौट आये तो हम भी लौटकर अपने जन्मभूमि पर जा रहा हूं। मै उनका अनुयायी हूं। जब वहा विदा लेने गया तो तो मेरे बारे यह कहते सुना कि सिध्दार्थ के पास गर्दन कटा आदमी आयेगा तो उसे भी जोड़ने की कोशिश करेगा। फिर मै जौनपुर आकर पैक्टिस शुरू कर दिया। मेरे पैसा कमाना उद्देश्य नही बल्की अपने अनुभवो से गरीब मरीजो का इलाज करके उनका जान बचाना है।
डा0 सिध्दार्थ ने बताया कि मुझे डाक्टर बनने की चाहत बचपन से थी इसके पीछे की  वजह रही मेरे गांव के  दो मरीज दोनो लोग मिर्गी रोग से पीडि़त थे जब उन्हे झटका आता था उनके  परिवार वाले किसी डाक्टर के पास जाकर औझा से झाड़ फंूक कराते थे।
उन्होने  बताया जब मैं हाई स्कूल की पढ़ाई करने के लिए शम्भूगंज जाता था उसी बाजार मेरे  पिताजी के मित्र दवाखाना चलते थे मै पढ़ाई साथ साथ उनके डिस्पेंसरी पर जाकर दवा की पुडि़या बधता था।
डासिध्दार्थ ने बताया कि मुझे डाक्टर बनाने में मेरी मां  का सबसे बड़ा योगदान है। क्यो कि मेरे पिता की तनख्वाह थी पांच सौ रूपये महीना मेरे कालेज की  फीस 6 सौ रूपये  पिता का पूरा वेतन मेरे फीस के  लिए  कम था उसकी भरपाई और घर का खर्च  चलाने के लिए  मेरी मां गांव के कुछ लोगो का खेत बटाई पर लेकर खेती करती थी उसी से मेरी फीस और घर अन्य लोगो को दो जून की रोटी कपड़ा मिलता था।

लालबहादुर ने अब  जिले में पेट के बड़े बड़े ट्यूमर कैंसर किडनी का आपरेशन करके मरीजो को जीवनदान दे चुके है। पेट में घड़ा फसने का आपरेशन किया तो सभी न्यूज चैनलो और अखबारो में प्रमुख्ता से छापी गयी। पेट से बाल का  गुच्छा निकाला तो अमेरिका की एक वेबसाईट पर पोस्ट हुई। इसके अलावा कई आपरेशन ऐसे रहे जिसे मीडिया ने प्रमुख्ता से प्रकाशित किया।
डा0 सिध्दार्थ अपनी सफलता का श्रेय अपने मां पिता के अलावा चाचा गुरूजन भगवान सिंह, राजनाथ सिंह, शैलेन्द्र , सूर्य प्रकाश पाण्डेय, ओमजी वर्मा, नरसिंह बहादुर सिंह  को दे रहे है। उन्होने  बताया इन्ही शिक्षको ने वेगैर किसी  भेदभाव के मुझे शिक्षा दिया जिसके कारण आज मै डाक्टर बन सका।

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