शीला दीक्षित पर कांग्रेसी दांव के बाद धर्मसंकट में भाजपा

  उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए शीला दीक्षित के नाम की घोषणा कर कांग्रेस पार्टी ने भाजपा को धर्मसंकट में फंसा दिया है। भाजपा की सबसे बड़ी मुश्किल अब मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार को घोषित करने को लेकर है। सूबे की दो बड़ी पार्टियों समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के चेहरे पहले ही सबके सामने हैं। अब कांग्रेस ने भी दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को उम्मीदवार घोषित कर बीजेपी पर भी ऐसा करने का दबाव बढ़ा दिया है। लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में ऐतिहासिक जीत हासिल करने वाली भाजपा अब सूबे का चुनाव उसी मजबूती से जीतने के दबाव में पहले से है। समाजवादी पार्टी से अखिलेश यादव यूपी में अगली पारी की उम्मीद लगाए बैठे हैं। तो बसपा में हर बार की तरह खुद मायावती ही एकमात्र चेहरा हैं। 26 साल से यूपी में वनवास झेल रही कांग्रेस तक ने अपने पत्ते खोल दिए और ब्राह्मण चेहरा शीला दीक्षित को सीएम उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतार दिया। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह यूपी में ताबड़तोड़ छोटी छोटी रैलियां कर रहे हैं। इन सब के बावजूद भाजपा मुख्यमंत्री उम्मीदवार के ऐलान में हिचकिचा रही है। सबसे बड़ा सवाल जो पार्टी के सामने खड़ा है, वो है कि आखिर सूबे में मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित किया जाए या नहीं। अगर किया जाए तो उससे भी बड़ा सवाल, किसे किया जाए। भाजपा के सामने धर्म संकट ये है कि कल्याण सिंह और राजनाथ सिंह के बाद उसके पास कोई ऐसी लीडरशिप नहीं है जिसे वो अपने चेहरे के तौर पर पेश कर सके। भाजपा चाहती है कि किसी ऐसे नेता को उम्मीदवार के तौर पर पेश किया जाए जो कास्ट इक्वेशन में फिट बैठता हो साथ ही साथ जिसके पास थोड़ा जनाधार भी हो। इसी को ध्यान में रखकर प्रदेश में स्टेट प्रेसीडेंट बनाने में भी मौर्य कम्युनिटी को चुना गया। प्रदेश में यादव के बाद मौर्य दूसरी सबसे बड़ी कम्युनिटी है। दरअसल यूपी का चुनाव पार्टी के लिए साख का चुनाव है। पार्टी के एक बड़े धड़े का मानना है कि उम्मीदवार घोषित करने का फायदा मिल सकता है। इसके पीछे की थ्योरी है कि सूबे की दो बड़ी पार्टियों समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के चेहरों से टक्कर लेने के लिए इन्हीं के कद का बड़ा नेता घोषित किया जाना चाहिए। पार्टी भले ही दलील दे लेकिन उसे भी मालूम है कि उम्मीदवार घोषित करने का ज्यादा फायदा मिल सकता है। दिल्ली और बिहार की बड़ी हार के बाद असम की जीत के बाद पार्टी के हौसले बुलंद हैं। इन सबके बीच लखनऊ के मेयर और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष दिनेश शर्मा, केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा, पिछड़ा वर्ग से जुड़े स्वतंत्र देव सिंह के नाम की भी चर्चा होती रहती है। लेकिन इन चेहरों पर दांव लगाने से गुटबाजी बढ़ सकती है। उधर कांग्रेस इस मुद्दे को लेकर भाजपा पर हमलावर है। सूत्रों की माने तो पार्टी का एक बड़ा वर्ग केंद्रीय गृहमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह पर दांव खेलना चाहता था। उनके नाम की घोषणा होने पर पार्टी की गुटबाजी पर भी अंकुश लगाया जा सकता है, लेकिन राजनाथ सिंह इसके लिए अब तक तैयार नहीं है। इनके बीच भाजपा विकास की रट लगाए है।

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