अश्लीलता में प्रेम और सौहार्द का संदेश देता है राजेपुर कजली का मेला

 जौनपुर। वर्तमान परिवेश में पश्चिमी संस्कृति के बढ़ते वर्चस्व के कारण अनेक भारतीय लोक परम्परायें या तो विलुपत हो गई अथवा विलुप्तता के कगार पर है। उन्ही भारतीय लोक पम्पराओं मे  एक नाम हैं , कजली जो अब पश्चिमी गीतों और धुनों की तर्ज पर विलुप्ता के कगार पर हैं इसके बावजूद सिंरकोनी ब्लाक मुख्यालय से लगभग चार किलोमीटर दूर पस्चिम की ओर बसा राजेपुर गांव में  लगनें वाला  ऐतिहासिक कजली का मेला विगत कई दशकों से भारतीय लोक गीत कजली के नाम की पहचान बनायें हुए हैं। पिछलें कई दशकों से चली आ रहीं यह ऐतिहासिक परम्परा इस वर्ष भी  हर्षोंल्लास पूर्वक मनायी जायेगी। कल मठमगरा का कार्यक्रम भी महिलाओं ने परंपरागत तरीके से किया। राजेेपुर गांव की कजली का ऐतिहासिक मेला गांव के समीप एक पोखरें पर लगाता है। लेकिन इस मेलें में कहीं भी कजली गीतों का मुकाबला या कजली गायकों का अखाड़ा नजर नहीं आता हैं ।  जबकि यह मेला कजली के मेले के नाम से सुविख्यात है। इस मेलें में अश्लीलता में प्रेम और सौहार्द को लिए शुरू व समाप्त होता हैं । जिसमें जीजा, साला-साली तथा दुल्हन जैसे रिश्तों  को लेकर गाली गलौज की बौछार के साथ अश्लील हरकतों के माध्यम से  राजेपुर और कचगांव के दुल्हों और बारातीयों द्धारा एक दूसरें पक्ष से दुल्हन की विदाई की मांग की जाती हैं आश्चर्य तो तब और होता है। जब दोनों पड़ोसी गांव राजेपुर के ऐतिहासिक पोखरें के दांे छोर पर हाथी , घोड़े , गदहें , खच्चर , और पालकी पर सवार दुल्हा और बाराती अपनें ही गांव घर की महिलाओं के सामनें अश्लील गालियों एवं अश्लील हाव भाव का घ्ंाटों प्रदर्शन करतें हुए प्रत्येक वर्षं बिना दुल्हन के अविवाहीत होकर घर वापस लौट जातें है। इस ऐतिहासिक मेले के बारें में  कजगांव के पटेल अरविन्द कुमार , विनोद शर्मा , सुरेन्द्र विश्वकर्मा का कहना है कि कजगाव और राजेपुर के लोगो का आपसी प्रेम सौहार्द ंतथा भाई चारें  का गहरा सम्बन्ध जुड़ा हुआ है। दोनों गांव के लोगों का भाव यह होता है कि अश्लीलता में भी प्यार और मोहब्बत का पैंगाम छिपा होता है। जो दूर दराज से आनें वालें लोगों के लिए एक दर्श है। यहीं कारण है कि दोनों गांव के लोग अशिष्ट हरकतों और शब्दों की बौछार के बावजूद आपसी प्रेम और सौहार्द का संदेश देता है। यहां के लोग कजली के मेले के माध्यम से प्रतिवर्ष समाज को यह संदेश देते है। कि  अश्लीलता में भी प्यार और आपसी सौहार्द का अनमोल खजाना छिपा होता है। इस मेले में हिन्दू तथा मुसलमान दोनो समंुदाय के लोग दुल्हा और बाराती होते है जिसमें एकता और अखण्डता तथा सदभाव का मिलन दिखाई देता है।  मेले के ऐतिहासिक पोखरेे में कजगांव स ेकुछ बालिकायें जरईं धोनें आयी थी । उसी समय  राजेपुर गांव की कुछ  बालिकायंें भी पोखरें पर आ गई दोनों पक्षों में कजली का दंगल शुरु हो गया जो दो दिन एक रात चलता रहां इससे प्रसन्न होकर राजेपुर गांव के जद्दू साव ने कजगांव की बालिकाओं को आदर सम्मान करतें हुए वस्त्र और आभूषण से सुसज्जित कर उनकी विदाई किया तभी से इस मेल का सुभारम्भ हुआ। जो आज भी बदस्तूर जारी है। दोनों गांव के दूल्हें एवं बारातियों से दुल्हन की मांग करतें हुए प्रत्येक वर्ष  कुआरें ही लौट जातें है।

Related

news 9097278467588769022

एक टिप्पणी भेजें

emo-but-icon

AD

जौनपुर का पहला ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल

आज की खबरे

साप्ताहिक

सुझाव

संचालक,राजेश श्रीवास्तव ,रिपोर्टर एनडी टीवी जौनपुर,9415255371

जौनपुर के ऐतिहासिक स्थल

item