कर्बला के शहीदों की याद में जामिया इमाम जाफर सादिक़ में खमसा मजालिस सम्पन्न,मातमी जुलुस में उमड़ा जनसैलाब
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जौनपुर । कर्बला के प्यासे शहीदों और असीराने कर्बला की याद में नगर के जामिया इमाम जाफर सादिक़ में खमसा मजलिसों का आयोजन किया गया । जिसमे हिंदुस्तान के प्रसिद्ध उलेमाओं ने मजलिस संबोधित किया । खमसे कि अंतिम मजलिस में कर्बला के शहीदों की याद में ताबूत और अलम की शबीह का जुलुस अकीदत व सोग के माहौल में मनाया गया। इस जिसमे नगर की प्रसिद्ध अंजुमनों ने नौहा व् मातम किया । सोगवारों ने कर्बला की दर्दनाक घटना का समां पेश करने वाले नौहे पढ़े तथा मातम किया। सोगवारों ने काले कपड़े पहन रखे थे। जुलूस में अलम कर्बला में इमाम हुसैन की फतह का एलान कर रहा था। खमसे की आखरी मजलिस को संबोधित करते हुए आल इंडिया शिया जागरण मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना हसन मेहदी ने कहा कि पैगम्बरे इस्लाम के नवासे इमाम हुसैन व उनके साथियों को कर्बला के मैदान में तीन रोज तक भूखा प्यासा रखने के बाद शहीद कर दिया गया था। इमाम के परिजनों को शहीदों की अंतिम रसूमात भी अदा नहीं करने दी गई थी। इमाम पर हुए इसी जुल्म की याद में पैगम्बर के अनुयायी हर साल शहीदों की मजलिस मनाते है। इस मौके पर शिया धर्मगुरु मौलाना सफदर हुसैन ज़ैदी ने कहा कि यजीद ने खुद को इस्लाम का खलीफा घोषित कर दिया था। यजीद की नीतिया पैगम्बर के अमन, शांति व समानता वाले इस्लाम के विपरीत थी। अपनी गलत नीतियों पर मुंहर लगवाने के लिए वो पैगम्बर के नवासे इमाम हुसैन से बैय्यत चाहता था। इमाम जानते थे कि यजीद की नीतियां इस्लाम व मानवता के लिए घातक होंगी। कर्बला की घटना यजीद के सामने इमाम के समर्पण न करने का नतीजा रही। उन्होंने कहा कि यजीद ने इमाम को शहीद करवाने के बाद उनके घरवालों को कैद करा दिया लेकिन उनके घर के एक बच्चे ने भी यजीद के सामने सिर नहीं झुकाया। इमाम हुसैन आज दुनियां में इंसाफ पसंद आन्दोलन की पहचान बन चुके है। उन्होंने कहा कि चेहलुम के अवसर पर ही यजीद की कैद से छुटने के बाद इमाम के घरवाले कर्बला में आए थे और चेहलुम मनाया था। अरब जगत में इसे अरबईन के नाम से जाना जाता है। मजलिस को मौलाना एजाज़ हसनैन , मौलाना जुल्फेकार , मौलाना शमशाद अली जाफरी लखनऊ के अलावा कई मौलानाओं ने मजलिस को ख़िताब किया । इस मौके पर हाजी असगर ज़ैदी , नजमुल हसन नजमी , अफसर अनमोल , आरिफ़ हुसैनी , शहीद हुसैन , अनवारुल हसन , तहसीन शाहिद , अज़ीज़ हैदर हिलाल , रियाज़ुल हसन के साथ हज़ारो की संख्या में मोमनीन उपस्तिथ रहे ।

