आस्था के साथ मनायी गयी नागपंचमी
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जौनपुर। जिले में आस्थ व विश्वास के साथ नागपंचमी का पर्व मनाया गया। आस्थावान लोगों ने शुक्रवार को सवेरे स्नान करने के उपरान्त नाग देवता का पूजन कर दूध लावा चढ़ाया। कई स्थानों पर मेले लगे और कुश्ती दंगल का आयोजन किया गया। महिलाओं और किशोरियों ने पेड़ों पर झूले डालकर कजरी लोक गीत गाया। कुछ स्थानों पर आल्हा का गायन भी हुआ। ज्ञात हो कि हिन्दी और संस्कृत में नाग का मतलब सांप है और नागों को समर्पित इस त्योहार के दिन उनकी पूजा की जाती है। हिन्दू धर्म में लोग सांपों को बहुत महत्व देते हैं। हिन्दू कैलेंडर में अनुसार श्रावण मास की शुक्ल पंचमी को नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है। शिव भक्तों के लिए श्रावण महीने का विशेष महत्व होता है। यह महीना पूर्ण रूप से भगवान शिव को समर्पित होता है और भगवान शिव के जीवन में सांपों का विशेष स्थान रहा है इसलिए यह दिन शिव भक्तों के लिए और भी खास हो जाता है। नाग पंचमी के दिन नाग देवता को दूध, चावल और फूल आदि समर्पित कर पूजा की जाती है ताकि भक्तों को उनका आर्शीवाद मिलें। हिन्दू पौराणिक कथाओं में नागों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। उन्हें पाताल लोक और नाग लोक का निवासी माना गया है, नाग पंचमी के दिन नागों की पूजा इसलिए की जाती है ताकि वह नकारात्मक ऊर्जा से हमारे परिवार की रक्षा करें। इस त्योहार के साथ ऐसी ही बहुत सारी कहानियां और किंवदंतियां जुड़ी हुई हैं।एक पौराणिक कथा के अनुसार कालिया नाम का एक सांप था जिसने एक बार यमुना नदी में अपना विष (जहर) छोड़ दिया जिस कारण ब्रजवासियों का पानी पीना मुश्किल हो गया था। तब भगवान श्री कृष्ण ने कालिया नाग के साथ युद्ध किया और उसे हराने के बाद यमुना नदी से सारा विष वापस लेने पर मजबूर कर दिया। इसके बदले में भगवान कृष्ण ने कालिया नाग को आशीर्वाद देते हुए कहा था कि जो भी मनुष्य नाग पंचमी को नागों को दूध पिलाएगा और उनकी पूजा करेगा वह सभी पापों और परेशानियों से मुक्त हो जाएगा। प्राचीन धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक अगर किसी जातक की कुंडली में कालसर्प दोष हो तो उसे नागपंचमी के दिन भगवान शिव और नागदेवता की पूजा करनी चाहिए। कहा जाता है कि इस दिन शिवलिंग और सांपों को दूध और चावल चढ़ाने आपके जीवन की सभी आपदायें दूर हो जाती हैं। नागों को लेकर हिन्दुओं का एक अलग ही विशवास रहा है। शास्त्रों में भी भगवान शिव के गले में पड़े एक सांप का वर्णन किया गया है। शिव गले में लगे तीन लच्छे भूत, भविष्य और वर्तमान के संकेत हैं। इतना ही नहीं भगवान विष्णु भी शांत और ध्यान की मुद्रा में पांच सिर वाले शेषनाग का प्रतिनिधित्व करते हैं।

