कन्या पूजन कर दी गयी विदाई
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जौनपुर। नवरिात्र के अन्तिम दिन श्रद्धालुओं ने घरो में कन्यापूजन उन्हे भोजन कराया। कुंवारी दस साल की सात या पांच कन्याओं को पास पड़ोस से बुलाया गया और उनका विधि विधान से पूजन कर हलवा, पूरी सहित अन्य व्यजंन परोसा गया और उनके खाने के बाद उपहार देकर विदा किया गया। नवरात्र के अंतिम दिन विधि- पूर्वक कन्या पूजन करना भी अति आवश्यक माना गया है। भविष्यपुराण और देवीभागवत पुराण के अनुसार नवरात्र पर्व के अंत में कन्या पूजन जरूरी माना गया है। कन्या पूजन के बिना नवरात्र व्रत को अधूरा माना जाता है। कन्या पूजन अष्टमी या नवमी में से किसी एक दिन करना श्रेष्ठ माना जाता है। कन्या पूजन के लिए दस वर्ष तक की नौ कन्याओं की आवश्यकता होती है। इन नौ कन्याओं की लोग को मां दुर्गा के नौ रूप समझकर ही पूजा करनी चाहिए। कन्या पूजन के लिए सबसे पहले व्यक्ति तो प्रातः स्नान कर विभिन्न प्रकार का भोजन पूरी ,हलवा, खीर, भुना हुआ चना आदि तैयार कर लेना चाहिए। सभी प्रकार के भोजन में से पहले मां दुर्गा को भोग लगाना चाहिए। दस वर्ष तक की नौ कन्याओं को घर पर भोजन करने के लिए बुलाना चाहिए। भोजन करना से पहले कन्याओं का पैर शुद्ध पानी से धोकर उन्हें भोजन के लिए साफ स्थान पर कपड़ा बिछाकर बिठाना चाहिए। कन्याओं को एक साथ बैठाकर उनके हाथों में रक्षा सूत्र बांधकर माथे पर रोली का टीका लगाना चाहिए। मां दुर्गा को जिस भोजन का भोग लगाया हो उसे सर्वप्रथम प्रसाद के रूप में कन्याओं को खिलाना चाहिए। जब कन्या पेट भर के भोजन कर ले तो उन्हें दक्षिणा में रुपया, सुहाग की वस्तुएं, चुनरी आदि वस्तुएं उपहार में अवश्य देनी चाहिए। अंत में कन्याओं के पैर छूकर उनसे आशीर्वाद लेकर उन्हें प्रेम पूर्वक विदा करना चाहिए।

