माफिया के इशारे पर मिलेगी शराब की दुकानें ?
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जौनपुर। सूबे में भाजपा सरकार आने के बाद शराब माफियाओं का खेल खत्म कर आम आदमी को रोजगार से जोड़ने के लिए सरकार ने नई आबकारी नीति अपनाते हुए जो व्यवस्था की उसमें भी माफियाओं ने सेंध लगा ली। इसका खुलासा उस वक्त हुआ जब कागजी कार्रवाई में उलझे लोगों ने अंतिम तारीख करीब आने पर लॉटरी के लिए आबकारी विभाग के सरकारी खाते में फीस जमा करनी चाही, लेकिन उनका पैसा उस खाते तक ट्रांसफर नहीं हो पाया। दो दिन तक साइट्स पर पैं¨डग शो होने के बाद लोगों की समझ में आ गया कि शराब माफियाओं की सह पर ही दुकानें हो पाएंगी। उन्होंने अपना ग्रुप बनाकर इस पारदर्शी व्यवस्था पर भी कब्जा कर लिया। नई व्यवस्था में सरकार ने आबकारी महकमे को आदेश दिए कि सभी आवेदन करने वालों को नियम-शर्तें बताकर खुली लॉटरी डलवाई जाए। भाग्य से ही जो पर्ची जिसके नाम निकलेगी उसके ही नाम दुकान आवंटित कर दी जाएगी। एक व्यक्ति एक ही दुकान के लिए आवेदन कर सकता है, ताकि कोई माफिया ज्यादा दुकानों पर कब्जा न कर सके। शासन की ओर से भेजी गई शर्तें काफी आसान थी, जिसमें हैसियत डीएम की ओर से बनाई गई ही वैध थी। सूत्रों के मुताबिक, माफियाओं ने अपना सिक्का बरकरार रखने के लिए नए नियम में सेंध लगा दी। संबंधित अधिकारियों से साठगांठ कर ली। इसी बीच आबकारी ने नया नियम बना दिया कि पुरानी हैसियत न होकर फार्म 39 ही मान्य होगा। फार्म 39 की प्रक्रिया पूरी करने में सभी के पसीने छूट गए। अनेक लोगों के ही कागजात कड़े नियमों की वजह से पूरे हो सके। जिले में शराब माफिया सिडिकेट बनाकर दुकानों को कब्जाने की जुगत में पूरा जाल बिछा चुका है। आरोप है कि उसने अपने लोगों की हैसियत बनवाकर आवेदन कराए हैं तो उसके ग्रुप से हटकर दुकान का आवेदन करने वालों की कागजी कार्रवाई ही पूरी नहीं होने दी है। लोगों का यहां तक भी कहना है कि आबकारी विभाग की वेबसाइट को माफिया ने हैक कर लिया है, जिसके जरिये धनराशि जमा होनी थी। जैसे ही नई आबकारी नीति आई, माफिया गैंग बनने लगा। जो लोग हैसियत के लिए आवेदन करते, उनके पास माफिया के गुर्गे पहुंच जाते। इसके बाद वह खुला आफर देने लगे कि पैसा और पूरी सिफारिश उनकी होगी। उनके नाम पर दुकान मिलती है तो बीस परसेंट वह दुकान वाले को घर बैठे का देंगे।

