डा. सिद्धार्थ ने बचाया रेनू का सुहाग, पति के पेट से निकला 4 किलो का इस्प्लीन
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जौनपुर।
कहते हैं कि चिकित्सक भगवान का दूसरा रूप होता है। इस कथन को जनपद के
वरिष्ठ सर्जन डा. लाल बहादुर सिद्धार्थ ने एक बार फिर से चरितार्थ कर दिया।
उन्होंने टाटा मेमोरियल हास्पिटल मुम्बई से वापस हुये मरीज की जान बचा ली।
मरीज को नयी जिन्दगी मिलने से जहां बच्चे अनाथ होने से बच गये, वहीं पत्नी
रेनू दूबे का सुहाग वापस लौट आया। मालूम हो कि जलालपुर क्षेत्र के हरिपुर
भिटवा निवासी आशीष दूबे 43 वर्ष विगत 4 वर्षों से पेट की बीमारी से ग्रस्त
थे। उन्होंने जनपद सहित बीएचयू व मुम्बई के टाटा हास्पिटल में दिखाया लेकिन
आराम नहीं मिला। आलम यह हो गया कि जहां उनकी तकलीफ बढ़ती गयी, वहीं आर्थिक
रूप से कमजोर भी हो गये। शरीर में ब्लड बनना पूरी तरह से बंद हो गया था।
किसी के बताने पर परिजन नगर के मैहर देवी मंदिर के पास स्थित सिद्धार्थ
हास्पिटल मल्टी स्पेशिएलिटी हास्पिटल साइंस एवं रिसर्च सेन्टर के वरिष्ठ
गेस्ट्रो लेप्रोस्कोपिक एवं कैंसर सर्जन डा. लाल बहादुर सिद्धार्थ को
दिखाया। उस समय मरीज की हालत एकदम बिगड़ चुकी थी। डा. सिद्धार्थ ने
जांचोपरान्त पेट में तिल (इस्प्लीन) होने की बात कही जो अपने अंतिम चरण में
था। परिजन के कहने पर वह आपरेशन करने के लियेय राजी हो गये। डा. सिद्धार्थ
ने अपनी टीम के साथ घण्टों कड़ी मशक्कत कर सफल आपरेशन किया जहां उसके पेट
से लगभग 4 किलो का बड़ा तिल (इस्प्लीन) निकला। अब पूरी तरह से स्वस्थ मरीज
की पत्नी रेनू दूबे ने बताया कि डा. सिद्धार्थ की जीवन भर आभारी रहूंगी।
उन्होंने एक तरह से बच्चों को अनाथ होने से बचाया। साथ ही मेरा सुहाग भी
नहीं उजड़ने दिया। इस बाबत पूछे जाने पर डा. सिद्धार्थ ने बताया कि पेट में
तिल बनने पर ब्लड बनना बंद हो जाता है। तिल शरीर में ब्लड बनने से रोकता है
जिससे सम्बन्धित मरीज की शक्ति प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है और वह असमय
ही काल के गाल में समा जाता है। इसका आपरेशन भी बड़ा ट्रिपकल होता है। अगर
कुछ और दिन तक मरीज के पेट का आपरेशन नहीं किया जाता तो तिल फट जाता जिससे
उसकी जान भी चली जाती। आपरेशन के दौरान डा. राजेश त्रिपाठी, डा. सतीश
पाण्डेय, डा. ओपी यादव, डा. राजेन्द्र, डा. विनोद यादव, मुन्ना सिद्धार्थ
सहित टीम के अन्य सदस्य का सहयोग सराहनीय रहा।

