ओडीएफ की राह में रोड़ा बने सचिव
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जौनपुर । सरकार का दावा है कि 2 अक्टूबर को जिला ओडीएफ जिला हो जाएगा। लेकिन पंचायत सचिवों की मनमानी इसमें सबसे बड़ी बाधक बन रही है। शौचालय निर्माण के लिए भेजे जाने वाले धन को भेजने में मानकों की अनदेखी से शौचालय लाभार्थियों में मायूसी है। इसी कारण कुछ ग्रामीण इसमें रूचि नहीं ले रहे हैं। कमिश्नर से लेकर डीएम तक का चेतावनी भरा आदेश हवा-हवाई ही साबित हो रहा है। हालात तो यहां तक हैं कि पहले से बने शौचालय के नाम पर भी धनराशि भेजकर सरकारी धन का बंदरबांट किया जा रहा है। बताते है कि जिन्होंने तनिक भी कार्य शुरू नहीं कराया उनके खाते में धनराशि भेज दी गई है। सूत्रों की मानें तो कुछ पुराने शौचालयों के नाम पर पहली किस्त भेज लूट-खसोट की जा रही है। इसको लेकर ग्रामीणों में आक्रोश है। इसी वजह से लोग शौचालय निर्माण में भी रूचि नहीं ले रहे हैं। पंचायत सचिव की इस मनमानी से तो नहीं लगता अगले कुछ महीनों में भी ओडीएफ हो पाएगी। यह स्थिति तब है जब अभी हाल ही कमिश्नर व डीएम ने पंचायती राज विभाग के कर्मियों पर आंखे तरेरी है। स्पष्ट निर्देश है कि जो सचिव लापरवाही करते है उन पर कार्रवाई किया जाए। लेकिन शायद इस चेतावनी का डर इन ग्राम स्तरीय कर्मियों को नहीं है। तभी तो, प्रोत्साहन राशि भेजने में भी मानकों की अनदेखी इस कदर निडर होकर कर रहे हैं। जिले में खुले में शौचमुक्त अभियान यहां पूरी तरह फ्लाप साबित हुआ है। खुले में शौच से गांवों को मुक्ति दिलाने (ओडीएफ) की बात हवा हवाई होकर रह गई है। हालत इतनी दयनीय है कि कार्य की गति कछुए की चाल से भी धीमी है। तीन साल से अधिक समय बीतने के बाद भी नाम मात्र के शौचालय गांवों में बनाए जा सके हैं। इसके पीछे मुख्य वजह प्रशासनिक लापरवाही और जागरुकता की कमी है। जब से यह योजना शुरू हुई तब से कई बार भुगतान न होने आदि कारणों से इसमें अड़ंगा पड़ता गया। कई बार महीनों काम ठप भी रहा। वर्तमान में भी भुगतान, संसाधनों की कमी सहित अन्य कारणों के चलते योजना पटरी पर लौट नहीं पा रही है। ऐसे में डेढ़ महीनों में लक्ष्य पूरा करना नामुमकिन ही है। वहीं जो गांव ओडीएफ घोषित कर दिए गए हैं वहां भी स्थिति गड़बड़ है। कई शौचालय दूसरे कामों में प्रयोग किए जा रहे हैं। कहीं उपले रखे जा रहे तो कहीं भूसा भरा पड़ा है। कहीं कहीं शौचालय अधूरे भी पड़े हैं। यह सब अभियान को मुंह चिढ़ा रहे अभियान के तहत पांच-पांच लोगों की टीमें अलग-अलग गांवों में भेजी जाती हैं। इसे चैंपियन टीम कहा जाता है। इनमें शामिल लोग सप्ताह में पांच दिन गांवों में रहते हैं। वहां लोगों को खुले में शौच से होने वाले नुकसान के बारे में बताते हैं। सीटी बजाते हैं, टोकाटाकी करते हैं और अन्य तरीकों से गांववालों को जागरूक करने का प्रयास करते हैं।

