जाने क्या है123वर्ष पुराना महामारी रोग अधिनियम,आपदा प्रबंधन एक्ट एवं दंड संबंधी प्रावधान

हिमांशु श्रीवास्तव एडवोकेट
 जौनपुर । कोविड-19 महामारी को फैलने से रोकने के लिए केंद्र सरकार ने आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 के तहत लॉकडाउन की घोषणा किया जिससे कोरोना महामारी को रोकने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग/ फिजिकल डिस्टेंसिंग के उपायों को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके।इस आदेश के जरिए पहली बार देश को इस अधिनियम के प्रावधानों के तहत बंद किया गया।यह भी पहली बार है जब केंद्र ने राज्यों को इस परिमाण के निर्देश जारी किए।अधिनियम की धारा 51 के 60 को पूरे देश में लागू कर दिया गया है जो दंड एवं अपराध के संज्ञान इत्यादि से संबंधित है।इस अधिनियम की धारा 51 के तहत यदि कोई व्यक्ति किसी सरकारी कर्मचारी को उसके कर्तव्य पालन से रोकता या बाधा डालता है या केंद्र या राज्य सरकारों के निर्देशों के पालन से इनकार करता है तो उसे 1 वर्ष तक कारावास एवं जुर्माने से दंडित किया जाएगा।यदि उस व्यक्ति के कार्य से जानमाल का नुकसान होता है तो कारावास 2 वर्ष एवं जुर्माना हो सकता है।जैसे-दिशानिर्देशों के उल्लंघन में पूजा स्थल पर जाना,सामाजिक कार्यक्रम का आयोजन करना आदि इस धारा के तहत अपराध माना जाएगा।धारा 52 के तहत वे मामले आएंगे जिसमें आरोपी ने राहत सहायता, मरम्मत,निर्माण इत्यादि का गलत दावा किया हो।इसमें 2 वर्ष कारावास व जुर्माने की सजा है।धारा 53 के तहत यदि कोई व्यक्ति राहत कार्यों या प्रयासों के लिए किसी भी पैसे या सामग्री का दुरुपयोग या अपने स्वयं के उपयोग के लिए करता है या उन्हें ब्लैक में बेचता है तो वह इस धारा के तहत 2 वर्ष कारावास एवं जुर्माने से दंडित किया जाएगा।धारा 54 और महत्वपूर्ण है जिसमें यह कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति आपदा के बारे झूठी सूचना देता है या इसकी गंभीरता के बारे में झूठी चेतावनी देता है जिससे घबराहट फैलती है और आम जनता के बीच आतंक फैलाने का कार्य झूठे कथनों द्वारा आपदा की गंभीरता को बताते हुए करता है तो वह 1 वर्ष कारावास या जुर्माने से दंडित किया जाएगा।धारा 55 सरकार के विभागों से संबंधित है।धारा 56 के तहत सरकारी कर्मचारी जिसे लाकडाउन से संबंधित कर्तव्य को करने का निर्देश दिया गया और वह उन्हें करने से मना कर दे या बिना अनुमति के अपने कर्तव्य को पूरा करने से पीछे हट जाए तो वह 1 वर्ष कारावास या जुर्माने से दंडित किया जाएगा।धारा 57 के तहत आवश्यकता पड़ने पर संसाधन,वाहन या भवनों के संबंध में अध्यपेक्षा का आदेश किया जाता है और जो व्यक्ति आदेश का पालन नहीं करता तो वह 1 वर्ष कारावास एवं जुर्माना से दंडित किया जाएगा।धारा 58 कंपनियों द्वारा अपराध से संबंधित है। धारा 59 अभियोजन के लिए पूर्व मंजूरी एवं धारा 60 न्यायालयों द्वारा अपराधों के संज्ञान से संबंधित है। स्वास्थ्य कर्मियों पर हमलों को देखते हुए महामारी रोग अधिनियम 1897 में 22 अप्रैल 2020 को संशोधन किया गया।स्वास्थ्य कर्मियों पर हमला करने वालों को कड़ी सजा देने का प्रावधान किया गया।राष्ट्रपति ने इस पर हस्ताक्षर कर अपनी मंजूरी दी और यह कानून बन गया। अध्यादेश कम से कम 6 महीने तक अवश्य लागू रहेगा।नई धारा 1A के तहत स्वास्थ्य सेवा कर्मियों को तंग करने वाले,क्षति पहुंचाने वाले, धमकी देने वाले या जीवन को खतरे में डालने वाले या अन्य किसी प्रकार की बाधा पहुंचाने वालों के लिए संशोधन किया गया।धारा 2A स्वास्थ्य कर्मियों के खिलाफ हिंसा और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने को प्रतिबंधित करती है।धारा 3(2) के तहत ऐसा करने वाले को 3 माह से 5 वर्ष तक कारावास और ₹50,000 से ₹2,00,000 जुर्माने तक की सजा से दंडित किया जाएगा। संपत्ति के नुकसान के मामले में मुआवजा नुकसान ग्रस्त संपत्ति के बाजार मूल्य का 2 गुना होगा।ऐसा अपराध संज्ञेय और गैर जमानती होगा।विवेचना इंस्पेक्टर रैंक के अधिकारी या इसके ऊपर के अधिकारी द्वारा एफ आई आर दर्ज होने के 30 दिन के भीतर पूरी की जाएगी और इससे संबंधित मुकदमा 1 वर्ष के भीतर खत्म करने की बात कही गई है।यदि मुकदमा 1 वर्ष के भीतर समाप्त नहीं होता तो जज को इसका कारण लिखना होगा। 123 साल पुराना महामारी अधिनियम अंग्रेजों के जमाने में लागू किया गया था जब भूतपूर्व मुंबई स्टेट में प्लेग ने महामारी का रूप लिया था। इस अधिनियम का उपयोग तब किया जाता है जब राज्य या केंद्र सरकार को यह विश्वास हो जाता है कि देश या राज्य में कोई बड़ा संकट आने वाला है या कोई खतरनाक बीमारी राज्य या देश में प्रवेश कर चुकी है और समस्त नागरिकों में फैल सकती है।महामारी अधिनियम 1897 लागू होने के बाद सरकारी आदेश की अवहेलना अपराध है।लाकडाउन का उल्लंघन करने वालों पर इस अधिनियम के तहत कार्रवाई हो सकती है। आईपीसी की धारा 188 के तहत भी सजा का प्रावधान है।अधिनियम की धारा 2b के अनुसार राज्य सरकार हर तरह की यात्रा से आने वाले यात्रियों का निरीक्षण करने में निरीक्षक नियुक्त कर सकती है।जिन लोगों पर संदेह होता है कि वह संक्रामक रोग से पीड़ित है निरीक्षक उन लोगों को अस्पताल या अस्थाई आवास केंद्र पर ले जा सकते हैं यदि कोई व्यक्ति या समूह महामारी से ग्रसित है तो उन्हें किसी अस्पताल या अस्थाई आवास में रखने का सरकार को अधिकार है इस अधिनियम के तहत जो सरकारी आदेश को नहीं मानेगा वह आईपीसी की धारा 188 के तहत छह माह की सजा और जुर्माने से दंडित किया जाएगा।1959 में उड़ीसा में हैजा के प्रकोप में,2009 में पुणे में स्वाइन फ्लू फैलने पर,2018 में गुजरात में कॉलरा के लक्षण पर,2015 में चंडीगढ़ में मलेरिया और डेंगू की रोकथाम के लिए इस ऐक्ट को लगाया जा चुका है। 2020 में कर्नाटक ने सबसे पहले कोरोना वायरस से निपटने के लिए महामारी अधिनियम 1897को लागू किया।यह कानून किसी भी व्यक्ति को हिरासत में लेने का अधिकार देता है जिस पर संक्रामक रोग की आशंका हो।कनिका कपूर पर महामारी एक्ट के तहत कार्रवाई की गई।जौनपुर जिले समेत संपूर्ण भारत में लाकडाउन के उल्लंघन में सैकड़ों मुकदमे दर्ज हुए।

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