दुर्योधन मोह में धृतराष्ट्र बन गए हैं उच्च शिक्षा मंत्री प्रो दिनेश शर्मा : डॉ विजय प्रताप तिवारी
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जौनपुर। बस पांच गाँव ही तो मांगा था कृष्ण ने , हस्तिनापुर से निर्वासित पांडवों के लिए। बदले में शांति और सहयोग का भरपूर आश्वासन। पुत्रमोह में अंधे हुए धृतराष्ट्र से ये पांच गाँव भी देते न बने, दुनिया महाभारत की साक्षी बनी , कौरव वंश का समूल नाश हो गया, अमरत्व का आशीर्वाद भी पितामह को बचा नही पाया, द्रोण और कृपाचार्य जैसे न जाने कितने ही योद्धाओ को अपने ही शिष्यो के आघात से मृत्यु का वरण करना हुआ। उत्तर प्रदेश के अनुदानित महाविद्यालयों में अनुमोदित प्राध्यापकों को भी माननीय उच्च न्यायालय ने न्यूनतम वेतनमान देने की ही तो बात की थी, मंत्री महोदय निजी शिक्षा रूपी कौरव कुल के मोह में इस प्रकार धृतराष्ट्र बने हैं कि उनको यह छोटी सी मांग भी मंजूर नही। इतिहास साक्षी है वाजिब मांगों की जब भी सत्ता संरचना द्वारा उपेक्षा की जाती है एक महाभारत की पटकथा तैयार हो जाती है। हम भी उसी संबेदनशील संधिकाल पर खड़े हैं जहाँ एक और महाभारत अवश्यम्भावी लगता है।"
उक्त विचार उत्तर प्रदेश अनुदानित महाविद्यालय अनुमोदित शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष डॉ विजय प्रताप तिवारी ने अपनी प्रेस विज्ञप्ति जारी कर व्यक्त किया । डॉ तिवारी ने बताया है कि कोरोना से प्रभावित इस काल मे जबकि प्रदेश और देश का राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व कोरोना से लड़ने में अहर्निश लगा हुआ है, अपने लोगों की सुरक्षा में प्रदेश का मुख्यमंत्री दिन रात एक किये हुए है वहीं प्रदेश के गैरजिम्मेदार उच्च शिक्षामंत्री निजी शिक्षा के प्रोत्साहन के निजी एजेंडे को लागू करने के लिए व्यग्र दिखाई दे रहे हैं। उत्तर प्रदेश के अनुदानित महाविद्यालयों में संचालित स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रमो में अनुमोदित उच्च योग्यताधारी शिक्षकों को न्यूनतम वेतनमान देने की जगह उनकी मंशा इन पाठ्यक्रमो को बंद करने की है। हर हथकंडा अपना रहे हैं, कि उच्च न्यायालय में सुनवाई सामान्य होने के पहले इन अध्यापकों को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाय।
इतने बड़े प्रदेश में मात्र 331 महाविद्यालयों को ही सरकारी अनुदान प्राप्त है यहां संचालित स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रमो में भी मानक के अनुरूप शिक्षक रखे जाते हैं , प्रबंधन भी अनुदानित महाविद्यालय होंने की गरिमा को सुरक्षित रखते हैं और संस्थाओ को धनउगाही का अड्डा नही बनने देते , जिसका परिणाम यह होता है कि यहां गरीब छात्र छात्राओं को भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने का अवसर उपलब्ध होता है। इन महाविद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तो दी जा सकती है किंतु अनैतिक साधनों का प्रयोग न कर पाने के कारण बाजार में प्रतिस्पर्धा नही कर सकते। अब इन पाठ्यक्रमो को बंद कर गरीबों से उच्च शिक्षा का अधिकार भी छीन लेना चाहते हैं और उच्च शिक्षा को मुट्ठी भर पैसे वालों के हाथों में केंद्रित करना चाहते हैं।
डॉ तिवारी ने उच्च शिक्षा विभाग के गैरजिम्मेदाराना रवैये पर आघात करते हुए बताया है कि इस विभाग का जन सरोकार से कोई वास्ता नही रह गया है , पहले इंडाउमेंट और मार्जिन मनी के लिए सारे मानको की उपेक्षा करते हुए हजारों महाविद्यालय खोल दिए गए । कभी व्यवस्था का कोई भी जिम्मेदार यह नही जानना चाहा कि इन महाविद्यालयों में शिक्षक हैं या नही ? प्राचार्य हैं या नही? सब कुछ जानने के बावजूद आंख बंद कर लेने वाले उच्च शिक्षा मंत्री आज अनुदानित महाविद्यालयों में स्ववित्तपोषित योजनान्तर्गत संचालित पाठ्यक्रमो के छात्र छात्राओं की गिनती करा रहे हैं । दुनिया को शून्य का महत्व समझाने वाले देश मे सैकड़े के नीचे की संख्या को अप्रासंगिक मानने का और शिक्षा को बाजार बनाने का घृणित खेल खेल रहे हैं।
प्रदेश अध्यक्ष ने उच्च शिक्षा मंत्री को चेतावनी के लहजे में कहा है कि यदि उच्च शिक्षामंत्री, हम अनुमोदित शिक्षकों के साथ यह सौतेलापन बन्द नही करते हैं तो मजबूरी में हम महाभारत के लिए बाध्य होंगे और उनकी सत्ता की शक्ति को सत्य और साहस के आत्मबल से पराजित करेंगे।

