अज्ञान ने ईश्वर जीव सम्बन्ध को मृग मरीचिका जैसा भ्रामक बना रखा है:शुभम महराज
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जौनपुर। जीव ईश्वर का ही अंश है लेकिन अज्ञान के कारण जीव भ्रम में ठीक उसी प्रकार रहता है जैसे रेगिस्तान में मृग को कुछ दूरी पर जल का भ्रम होता है। राहगीर को सड़क पर चलते समय कुछ दूरी पर जल प्रतीत होता है लेकिन वास्तव में जल होता नहीं है।तालाब में पानी की सतह पर काई जमें होने पर पानी का पता हमें नहीं चलता है जैसे ही हम काई को हटाते हैं जल का अस्तित्व हमें दिखने लगता है ऐसे ही अज्ञान के दूर होने पर जीव स्वयं को ईश्वर का ही अंश महसूस करने लगता है।श्री मद् भागवत कथा का श्रवण करके उसका फल प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को निष्कपट धर्म का पालन करने वाला होना चाहिए।श्री मद् भागवत कथा सुनने की पात्रता श्रोता को मत्सर रहित होना चाहिए। मच्छर तो बाहर से डंसता है मत्सर ईर्ष्या जलन के रुप में हमारे जीवन को अंदर से डंसता रहता है।श्री मद् भागवत कथा के श्रवण और आत्मसात करने पर तीनों तापों का उन्मूलन हो जाता है।
यह बातें मीरगंज के श्री राम जानकी मंदिर, पंगुल आश्रम में आत्मानंद जी महाराज के सानिध्य में चल रही श्री मद् भागवत कथा के तीसरे दिन कथा वाचक शुभम महराज ने कथा श्रवण हेतु पधार भक्तों से कहीं।कथा के संगीतमय पाठ में प्रदीप शुक्ला,उमेश और विनय मिश्रा वाद्य यंत्रों को बजा कर सहयोग कर रहे थे।कथा का समापन 14 फरवरी को होगा उसी दिन श्री शत् चंडी महायज्ञ की पूर्णाहुति एवं विशाल भंडारे का आयोजन होगा।

