गाय को संपत्ति मानने वालों को ललकारना जरूरी: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद
शंकराचार्य ने कहा कि जौनपुर की यह धरती महर्षि यमदग्नि और भगवान परशुराम की तपोभूमि रही है। गोमती नदी के किनारे ही गाय की सेवा और संरक्षण की परंपरा रही है। उन्होंने कहा कि जमैथा गांव में गोमती नदी के तट पर महर्षि यमदग्नि ने गाय की सेवा की थी। उस समय के राजा ने जबरन उनकी गाय छीन ली थी। जब यह बात उनके पुत्र भगवान परशुराम को पता चली तो उन्होंने अन्याय के खिलाफ खड़े होकर राजा और उसकी सेना का वध कर गाय को वापस लिया था।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि गाय भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में माता के समान मानी जाती है। यदि शासन व्यवस्था उसे केवल संपत्ति मानकर देखेगी तो यह परंपरा और आस्था का अपमान है। इसलिए संत समाज इस विषय पर आवाज उठाने को बाध्य है।
उन्होंने कहा कि जौनपुर आकर महर्षि यमदग्नि का आशीर्वाद लेकर वह अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करने का संकल्प लेकर निकले हैं। उन्होंने कहा कि संत समाज का दायित्व है कि वह समाज और धर्म की रक्षा के लिए समय-समय पर सच बोले और अन्याय का विरोध करे।
इस दौरान आश्रम में बड़ी संख्या में साधु-संत और श्रद्धालु मौजूद रहे। शंकराचार्य ने आश्रम में पूजा-अर्चना कर देश और समाज के कल्याण की कामना भी की।

