10 साल का ‘ट्रैवल बैन’ खत्म, फिर भी सऊदी में कैद जैसी जिंदगी! जौनपुर के बेटे की वतन वापसी को तरसता परिवार
जौनपुर।जनपद के मड़ियाहूं तहसील अंतर्गत महुआरी गांव से एक बेहद मार्मिक और हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जहां एक बुजुर्ग पिता अपने बेटे की वतन वापसी के लिए दर-दर गुहार लगाने को मजबूर है। सऊदी अरब में फंसे अरविंद कुमार तिवारी की कहानी अब सिस्टम पर कई सवाल खड़े कर रही है।
पिता गंगाधर तिवारी ने विदेश मंत्री को भेजे अपने प्रार्थना पत्र में बताया कि उनका पुत्र अरविंद वर्ष 2010 में रोजगार की तलाश में सऊदी अरब गया था। वह वैध पासपोर्ट और वीजा के साथ वहां काम कर रहा था, लेकिन वर्ष 2018 में उस पर धोखाधड़ी का मामला दर्ज कर दिया गया। इसके बाद सऊदी प्रशासन ने उस पर 10 साल का ट्रैवल बैन लगा दिया।
2022 में बरी, फिर भी नहीं मिली आज़ादी!
हैरानी की बात यह है कि वर्ष 2022 में सऊदी की अदालत ने अरविंद को सभी आरोपों से पूरी तरह बरी कर दिया। इसके बावजूद न तो उसका ट्रैवल बैन हटाया गया और न ही उसे भारत लौटने की अनुमति दी गई। हालात ऐसे हैं कि वह आज भी सऊदी अरब में फंसा हुआ है, बिना किसी स्थायी रोजगार के बेहद कठिन परिस्थितियों में जीवन यापन कर रहा है।
‘समझौते’ के नाम पर वसूली का आरोप
मामले में एक नया मोड़ तब आया जब कार रेंटल कंपनी द्वारा कथित रूप से 15 हजार रियाल की मांग की जाने लगी। जबकि पहले 41,200 रियाल में समझौते की बात सामने आई थी। पीड़ित परिवार का आरोप है कि यह पूरी तरह से अवैध वसूली की कोशिश है और उनके बेटे को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है।
‘बेटा जेल में नहीं, फिर भी कैद जैसी हालत’
गंगाधर तिवारी का कहना है कि उनका बेटा किसी जेल में नहीं है, उसके खिलाफ कोई मामला लंबित भी नहीं है, फिर भी उसे भारत लौटने से रोका जा रहा है। उन्होंने इसे “खुलेआम अन्याय” बताया।
बुजुर्ग पिता की टूटती उम्मीदें
खुद को बीमार और वृद्ध बताते हुए गंगाधर तिवारी कहते हैं कि बेटे के विदेश में फंसे रहने से पूरा परिवार मानसिक और आर्थिक संकट में डूब चुका है। घर की जिम्मेदारियां पूरी तरह ठप हो गई हैं और वह खुद भी असहाय महसूस कर रहे हैं।
सरकार से आखिरी उम्मीद
उन्होंने विदेश मंत्री से भावुक अपील करते हुए कहा है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और उनके बेटे की सुरक्षित भारत वापसी सुनिश्चित की जाए।
यह मामला न सिर्फ एक परिवार की पीड़ा को उजागर करता है, बल्कि विदेश में फंसे भारतीयों की मदद और सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

