सब्र, वफ़ादारी और बहादुरी की मिसाल: हज़रत अब्बास
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जौनपुर। ग्राम दक्षिण पट्टी बबरखा स्थित हुसैनिया इमामबाड़े में जश्न-ए-हज़रत अब्बास का भव्य आयोजन किया गया, जिसकी शुरुआत तिलावत-ए-क़ुरआन और हम्द-ए-पाक से हुई। इस अवसर पर मौलाना महफूज़-उल-हसन ख़ान साहब ने अपने बयान में कहा कि हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम सब्र, वफ़ादारी और बहादुरी की बुलंद मिसाल हैं तथा उनकी ज़िंदगी इंसानियत के लिए बेहतरीन रहनुमाई पेश करती है। कार्यक्रम का संचालन प्रोफेसर अब्बास रज़ा नैय्यर साहब ने किया। उन्होंने अपने संबोधन में हज़रत अब्बास की शख्सियत को तालीम से जोड़ते हुए कहा कि जिस तरह कर्बला में उनकी ज़िंदगी वफ़ा, सब्र और इंसानियत का पैग़ाम देती है, उसी तरह इल्म भी इंसान को सच्चाई, अख़लाक़ और इंसानियत की राह पर चलना सिखाता है; तालीम केवल डिग्री हासिल करने का माध्यम नहीं बल्कि एक बेहतर इंसान बनने की बुनियाद है और यही समाज की तरक्की की असली कुंजी है। देश के विभिन्न शहरों से आए शायरों ने अपने उत्कृष्ट कलाम पेश कर महफिल को रूहानी रंग दिया। यह जश्न हज़रत अब्बास की याद में मनाया गया, जो हज़रत इमाम हुसैन के भाई थे और कर्बला के मैदान में अपनी शुजाअत, वफ़ादारी और बहादुरी के लिए मशहूर रहे, जिनकी हैबत से दुश्मन फौज खौफज़दा रहती थी। कार्यक्रम में वक्ताओं ने इल्म व तालीम की अहमियत पर भी ज़ोर देते हुए कहा कि तालीम इंसान की कामयाबी और शख्सियत की बुलंदी का सबसे बड़ा ज़रिया है। इस मौके पर मशहद जलालपुरी ने पढ़ा— “खड़े हैं ख़दीमे अब्बास होर्मुज पर, जहाज़ अपना कोई बढ़ाए तो हम जानें”, काज़िम जरवली ने कहा— “बहुत सहल है शीरख़्वार से लड़ना, नज़र ज़री से कोई मिलाए तो हम जानें”, जबकि प्रोफेसर अब्बास रज़ा नैय्यर साहब ने कहा— “खुदा की आँखों का नाम है अब्बास, नज़र ज़री से कोई मिलाए तो हम जानें।” इस अवसर पर मौलाना जूहैर जावेद गोपालपुरी, फाजिल जरेलवी, रज़ा रन्नवी, सहर अर्शी, सलमान ताबिश, सलीम बलरामपुरी, असद नसीराबाद सहित अनेक शायरों ने अपने कलाम पेश किए, जबकि मोहम्मद हसन, आले हसन, मौलाना हैदर मेहंदी, रागिब रज़ा, मसूद अली, गुफरान सज्जाद, मोहम्मद अहसन, अहमद अब्बास ख़ान सहित सैकड़ों की संख्या में लोग मौजूद रहे।

