अदालत में पलटे गवाह: 'पेड़ से टकराकर' आई चोटें, कातिलाना हमले के आरोपी अधिवक्ता समेत 3 बरी

 रिपोर्ट - हिमांशु श्रीवास्तव एडवोकेट 

जमीन की जंग या गवाही का खेल? पूर्व प्रधान के परिवार पर कुल्हाड़ी-लाठी बरसाने के आरोप से हुए दोषमुक्त

जौनपुर। क्या कोर्ट रूम में आकर किसी बड़े हमले की खौफनाक कहानी महज एक 'हादसे' में बदल सकती है? बक्सा थाना क्षेत्र के सवंसा गांव में ऐसा ही एक हैरान कर देने वाला मोड़ सामने आया है। जिस जमीन की रंजिश में पूर्व प्रधान और उनके पूरे परिवार के लहूलुहान होने का दावा किया गया था, वह मामला अदालत में पहुंचते ही गवाहों के पलटने (पक्षद्रोही होने) के चलते ताश के पत्तों की तरह ढह गया।

​अपर सत्र न्यायाधीश सुरेंद्र प्रताप यादव की अदालत ने साक्ष्य के अभाव में दीवानी न्यायालय के अधिवक्ता आशुतोष उपाध्याय समेत तीन आरोपियों को बाइज्जत दोषमुक्त कर दिया है।


*​क्या था खूनी संघर्ष का वह खौफनाक आरोप?*

​शिकायतकर्ता चंद्रमणि उपाध्याय के मुताबिक, मामला 24 अक्टूबर 2011 की सुबह का है। पुरानी जमीनी रंजिश को लेकर आशुतोष उपाध्याय, उनके भाई राकेश, लवकुश और अजय एक राय होकर विवादित जंगली पेड़ काटने लगे थे। जब विरोध किया गया, तो आरोपियों ने कथित तौर पर घर में घुसकर कुल्हाड़ी और लाठी-डंडों से तांडव मचा दिया।

​इस जानलेवा हमले में:

​पूर्व प्रधान राम जी उपाध्याय

​उनकी पत्नी शिव कुमारी

​भाई इंद्रमणि और उनकी पत्नी संध्या

​भतीजा नीरज

​सभी को गंभीर रूप से घायल करने का आरोप था। पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत में चार्जशीट भी दाखिल की थी।


*​अदालत में 'अजूबा': पेड़ से टकराकर घायल हुआ परिवार!*

​इस सनसनीखेज मामले में नया और चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब कोर्ट की कार्यवाही शुरू हुई। पूर्व प्रधान राम जी उपाध्याय को छोड़कर, परिवार के बाकी सभी गवाह अदालत में पूरी तरह मुकर गए।

​गवाहों ने कोर्ट में जो बयान दिया, उसने सबको हैरत में डाल दिया। गवाहों का कहना था कि— "जंगली पेड़ की डाल काटने के दौरान लोग डाल और पेड़ से ही टकराकर घायल हो गए थे। आरोपियों ने न तो कोई मारपीट की, न गाली दी और न ही कोई धमकी दी।"


​मामले की पैरवी में लापरवाही का आलम यह रहा कि कोर्ट के सामने घायल करने वाली डॉक्टर की रिपोर्ट (मेडिकल साक्ष्य) तक परीक्षित नहीं कराई जा सकी।

एक की मौत, बाकी हुए पाक-साफ

​पूर्व प्रधान राम जी उपाध्याय ने अपने परिवार को आई चोटों की बात तो दोहराई, लेकिन वह आरोपियों को आई चोटों के बारे में कोर्ट को संतुष्ट नहीं कर सके। रही-सही कसर बाकी गवाहों ने पूरी कर दी, जिन्होंने खुद राम जी के ही बयान को झूठा करार दे दिया।

​नतीजतन, अदालत ने 'संदेह का लाभ' देते हुए आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में दोषमुक्त कर दिया। इस लंबी कानूनी लड़ाई के दौरान एक आरोपी राकेश की मौत हो चुकी है, जबकि अधिवक्ता आशुतोष समेत तीन अन्य आरोपी अब इस संगीन मामले से पूरी तरह बरी हो चुके हैं।

 समाज में आज भी यह चर्चा का विषय है कि क्या वाकई यह महज एक हादसा था, या फिर अदालत के कटघरे तक पहुंचते-पहुंचते रसूख और समझौतों के खेल ने गवाहों की जुबान पर ताला लगा दिया?

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