पिता का साया उठा तो टूट गए सपने, लेकिन हौसले ने बदल दी तकदीर,आज शिक्षा से होटल कारोबार तक सफलता की नई मिसाल हैं अनुराग सिंह

जौनपुर। जिंदगी कभी-कभी ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है, जहां इंसान के सामने दो ही रास्ते बचते हैं—या तो परिस्थितियों के आगे घुटने टेक दे, या फिर संघर्ष को अपनी ताकत बना ले। जौनपुर के अनुराग सिंह ने दूसरा रास्ता चुना। जिस युवक ने बेंगलुरु से एमसीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद लाखों के पैकेज वाली नौकरी हासिल की थी और सिंगापुर जाकर करियर बनाने की तैयारी कर रहा था, उसी युवक को पिता के असमय निधन ने सब कुछ छोड़कर अपने घर लौटने पर मजबूर कर दिया। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। संघर्ष को ही अपनी पूंजी बनाया और आज शिक्षा, कौशल विकास और होटल व्यवसाय के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान स्थापित कर दी। इन व्यवसायों से करीब ढाई सौ लोगों को रोजगार मिला है।

अनुराग सिंह ने वर्ष 2003 में बेंगलुरु से एमसीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद एक सॉफ्टवेयर कंपनी में करीब पांच लाख रुपये वार्षिक पैकेज पर नौकरी शुरू की। उनके उज्ज्वल भविष्य की तस्वीर लगभग तय हो चुकी थी। सिंगापुर में बेहतर अवसर मिलने की तैयारी भी चल रही थी। परिवार और स्वयं अनुराग को विश्वास था कि अब सफलता की नई उड़ान शुरू होने वाली है।

लेकिन वर्ष 2008 में अचानक उनके पिता इंद्रपति सिंह का निधन हो गया। यह घटना केवल एक बेटे के लिए पिता को खोने का दुख नहीं थी, बल्कि पूरे परिवार की आर्थिक और सामाजिक जिम्मेदारियां भी उनके कंधों पर आ गईं। मजबूरी में उन्हें अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर जौनपुर लौटना पड़ा। जिन सपनों को लेकर वे विदेश जाने की तैयारी कर रहे थे, वे एक पल में बिखर गए।

घर लौटने के बाद परिस्थितियां बेहद कठिन थीं। परिवार आर्थिक संकट से गुजर रहा था। अनुराग ने तय किया कि नौकरी तलाशने के बजाय वह ऐसा काम करेंगे, जिससे अपने साथ दूसरों को भी रोजगार मिल सके। वर्ष 2010 में उन्होंने कंप्यूटर इंस्टीट्यूट खोलने का निर्णय लिया। लेकिन सबसे बड़ी समस्या पूंजी की थी।

संस्थान शुरू करने के लिए एक लाख 75 हजार रुपये की जरूरत थी। रिश्तेदारों और दोस्तों के सहयोग से किसी तरह डेढ़ लाख रुपये जुट गए, लेकिन शेष 25 हजार रुपये का इंतजाम करना सबसे कठिन साबित हुआ। उस समय हर दिन चिंता और अनिश्चितता से भरा था। अंततः किसी तरह रकम पूरी हुई और संस्थान की नींव रखी गई।

संघर्ष यहीं खत्म नहीं हुआ। फर्नीचर तैयार था, लेकिन उसे रंग-रोगन कराने तक के पैसे नहीं बचे थे। तब अनुराग सिंह और उनके छोटे भाई यशवंत सिंह ने खुद ही ब्रश उठाया और रात-दिन मेहनत करके पूरे फर्नीचर पर पेंट किया। दोनों भाइयों ने किसी काम को छोटा नहीं समझा। दिन में संस्थान की तैयारी और रात में मेहनत—यही उनकी दिनचर्या बन गई।

अनुराग सिंह भावुक होकर बताते हैं कि उस कठिन दौर में उनके छोटे भाई यशवंत सिंह ने भगवान राम के छोटे भाई लक्ष्मण की तरह हर कदम पर उनका साथ निभाया। जब भी मुश्किल आई, दोनों भाइयों ने एक-दूसरे का हौसला बढ़ाया। यही अटूट विश्वास और मेहनत उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी।

उनकी मेहनत रंग लाई। कंप्यूटर इंस्टीट्यूट धीरे-धीरे सफलता की ओर बढ़ा। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। वर्ष 2014 में पवई (आजमगढ़) में आईटीआई, फिर श्यामा आईटीआई जौनपुर (गंगापट्टी, सीएमओ कार्यालय के पास) तथा मां श्यामा आईटीआई की स्थापना की। शिक्षा के क्षेत्र में लगातार विस्तार करते हुए वर्ष 2019 में श्यामा वर्ल्ड स्कूल की शुरुआत की, जहां गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराई जा रही है।

इसके बाद अनुराग सिंह ने आतिथ्य क्षेत्र में भी कदम रखा। वर्ष 2022 में स्टेट बैंक के पास होटल, वर्ष 2023 में वाजिदपुर तिराहे पर इंद्र पैलेस, और फिर लखनऊ वाराणसी हाईवे पर  नेवादा गांव में इंद्र रिसाल्ट नाम से आधुनिक होटल स्थापित किया। अनुराग ने बताया कि जल्द ही उनका होटल व्यवसाय जौनपुर तक सीमित नहीं रहेगा, जल्द ही काशी, मथुरा, अयोध्या और प्रयागराज जैसे प्रमुख धार्मिक शहरों तक विस्तार होगा।

अनुराग सिंह का मानना है कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। यदि इरादे मजबूत हों और मेहनत ईमानदार हो, तो विपरीत परिस्थितियां भी मंजिल का रास्ता बन जाती हैं। वे कहते हैं कि पिता का निधन उनके जीवन का सबसे बड़ा दुख था, लेकिन उसी घटना ने उन्हें जिम्मेदार बनाया और संघर्ष करना सिखाया।

आज अनुराग सिंह की कहानी उन हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो छोटी-छोटी असफलताओं से निराश हो जाते हैं। यह कहानी बताती है कि सपने टूट सकते हैं, लेकिन हौसले नहीं टूटने चाहिए। हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, यदि परिवार का साथ, मेहनत पर विश्वास और कुछ कर गुजरने का जज्बा हो, तो सफलता एक दिन जरूर कदम चूमती है।


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