गरीबी से लड़ते-लड़ते इस कंप्यूटर ऑपरेटर ने लिख दी अपनी तकदीर, आज है चार अखबारों का मालिक
10 रुपये की मजदूरी से चार अखबारों के मालिक तक, संघर्ष की मिसाल बने रामजी जायसवाल
गरीबी, पिता के निधन और संघर्षों ने नहीं तोड़ा हौसला, 1500 रुपये की नौकरी से शुरू हुई यात्रा आज हजारों पत्रकारों के लिए बनी प्रेरणा
जौनपुर। जिंदगी हर किसी को एक जैसा अवसर नहीं देती। कुछ लोगों को मंजिल विरासत में मिल जाती है, जबकि कुछ लोग अपनी किस्मत खुद लिखते हैं। जौनपुर के वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक रामजी जायसवाल उन्हीं लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने अभावों को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि सफलता की सीढ़ी बना लिया। कभी 10 रुपये की दिहाड़ी पर टाइपराइटर की दुकान में काम करने वाला यह युवक आज चार समाचार पत्रों का स्वामी और संपादक है। उनकी कहानी सिर्फ एक पत्रकार की सफलता की दास्तान नहीं, बल्कि उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो कठिन परिस्थितियों में अपने सपनों को साकार करने का साहस रखते हैं।नगर के नखास मोहल्ले के एक साधारण परिवार में 30 जून 1977 को जन्मे रामजी जायसवाल का बचपन आर्थिक तंगी के बीच बीता। परिवार की हालत ऐसी थी कि पढ़ाई जारी रखने के लिए उन्हें कम उम्र में ही काम करना पड़ा। सुबह-शाम पढ़ाई और दिनभर मेहनत—यही उनकी दिनचर्या बन गई। टाइपराइटर की दुकान पर मात्र 10 रुपये प्रतिदिन की मजदूरी और बाद में 200 रुपये महीने पर अखबार बांटने का काम उनके संघर्ष की पहली सीढ़ी था। उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यही युवक एक दिन खुद अखबारों का मालिक बनेगा।
पत्रकारिता के प्रति जुनून उन्हें वर्ष 2000 में जौनपुर से प्रकाशित हिंदी दैनिक 'दैनिक मान्यवर' तक ले गया, जहां उन्होंने कंप्यूटर ऑपरेटर के रूप में महज 1500 रुपये प्रतिमाह के वेतन पर नौकरी शुरू की। इसके बाद उन्होंने 'तरुण मित्र' में भी इसी वेतन पर काम किया। वेतन कम था, लेकिन सपने बड़े थे। हर दिन वे सिर्फ नौकरी नहीं करते थे, बल्कि पत्रकारिता की बारीकियों को सीख रहे थे और अपने भविष्य की मजबूत नींव तैयार कर रहे थे।
संघर्ष का सबसे कठिन दौर तब आया, जब वर्ष 2001 के पहले ही दिन उनके पिता का असमय निधन हो गया। परिवार की सारी जिम्मेदारियां अचानक उनके कंधों पर आ गईं। आर्थिक संकट गहराता गया, लेकिन उन्होंने हालात के आगे घुटने नहीं टेके। कई बार परिस्थितियों ने उन्हें तोड़ने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने खुद को बिखरने नहीं दिया। लगभग 11 वर्षों तक मात्र 1500 रुपये की नौकरी करते हुए उन्होंने परिवार भी संभाला और अपने सपनों को भी जिंदा रखा।
रामजी जायसवाल मानते थे कि नौकरी जीवनयापन का साधन हो सकती है, लेकिन पहचान बनाने के लिए कुछ अलग करना जरूरी है। इसी सोच के साथ वर्ष 2007 में उन्होंने 'तेजस' नाम से समाचार एजेंसी की शुरुआत की। उनकी मेहनत, निष्पक्षता और खबरों की विश्वसनीयता ने जल्द ही पहचान बना ली। देखते ही देखते दो दर्जन से अधिक समाचार पत्रों में उनकी एजेंसी की खबरें प्रकाशित होने लगीं। यह उनके आत्मविश्वास का सबसे बड़ा आधार बना।
दो वर्ष बाद वर्ष 2009 में उन्होंने अपना सपना साकार करते हुए 'तेजस टुडे' दैनिक समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू किया। निष्पक्ष, निर्भीक और जनहित की पत्रकारिता ने इस अखबार को कम समय में ही पूर्वांचल के प्रमुख समाचार पत्रों की कतार में ला खड़ा किया। सफलता यहीं नहीं रुकी। उन्होंने 'तेजस' नाम से उर्दू, साप्ताहिक और पाक्षिक समाचार पत्रों का भी प्रकाशन शुरू किया। आज उनके समाचार पत्र उत्तर प्रदेश के साथ-साथ बिहार और झारखंड तक प्रकाशित हो रहे हैं और हजारों पाठकों का विश्वास जीत चुके हैं।
रामजी जायसवाल ने सिर्फ अपना भविष्य नहीं संवारा, बल्कि पत्रकारों के सम्मान और अधिकारों की लड़ाई को भी अपनी जिम्मेदारी बनाया। उन्होंने गोमती जर्नलिस्ट एसोसिएशन की स्थापना कर पत्रकारों को एक मजबूत मंच दिया। संगठन के माध्यम से पत्रकारों की समस्याओं को उठाने और उनके हितों की रक्षा के लिए लगातार प्रयास किए। उनके नेतृत्व और कार्यशैली को देखते हुए जौनपुर संपादक मंडल ने पहले उन्हें महासचिव और बाद में अध्यक्ष का दायित्व सौंपा।
पत्रकारिता के अलावा सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही है। समाज सेवा के प्रति समर्पण को देखते हुए श्री लक्ष्मी पूजा महासमिति ने उन्हें पहले महामंत्री और बाद में अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी। वे हमेशा मानते रहे हैं कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाना भी पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है।
आज रामजी जायसवाल की जीवन यात्रा इस बात का जीवंत उदाहरण है कि सफलता के लिए न धन जरूरी है, न ऊंची पहुंच। जरूरी है तो केवल मेहनत, ईमानदारी, धैर्य और अपने लक्ष्य के प्रति अटूट विश्वास। 10 रुपये की दिहाड़ी से शुरू हुआ यह सफर आज चार समाचार पत्रों के स्वामित्व तक पहुंच चुका है। उनकी कहानी हर उस युवा के लिए प्रेरणा है, जो अभावों से घबराता नहीं, बल्कि उन्हें अपनी ताकत बनाकर आगे बढ़ना चाहता है।
सच तो यह है कि संघर्ष इंसान को कमजोर नहीं करता, बल्कि उसे इतना मजबूत बना देता है कि एक दिन वही संघर्ष उसकी सबसे बड़ी पहचान बन जाता है।

