कलम छोड़ थाम ली बंदूक, अंग्रेजी हुकूमत की नींद उड़ाने वाला जौनपुर के वीर सपूत थे पं. रामनरेश शर्मा

 आज़ादी के रणबांकुरे पं. रामनरेश शर्मा: जिन्होंने जेल, यातनाएं और फरारी झेली, लेकिन अंग्रेजों के आगे कभी नहीं झुके

शिराजे हिन्द डॉट कॉम की यह रिपोर्ट स्वतंत्रता दिवस विशेष

भारत की स्वतंत्रता का इतिहास केवल बड़े राष्ट्रीय नेताओं के संघर्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि गांव-गांव के उन गुमनाम योद्धाओं के त्याग और बलिदान से भी लिखा गया है, जिन्होंने अपना सर्वस्व देश के नाम कर दिया। जौनपुर जनपद के बदलापुर क्षेत्र के ग्राम ओका के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय पंडित रामनरेश शर्मा ऐसे ही महान क्रांतिकारी थे, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की यातनाएं, जेल की सलाखें, आर्थिक कठिनाइयां और नौ महीने तक फरारी का जीवन झेला, लेकिन भारत माता को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराने के अपने संकल्प से कभी पीछे नहीं हटे।

अनाथ बचपन ने गढ़ा संघर्षशील व्यक्तित्व

1 सितंबर 1915 को एक गरीब ब्रह्मभट्ट ब्राह्मण परिवार में जन्मे पंडित रामनरेश शर्मा का बचपन अत्यंत कठिन परिस्थितियों में बीता। जन्म के कुछ दिनों बाद ही माता का निधन हो गया और लगभग एक वर्ष बाद पिता पंडित केशव प्रसाद भी संसार छोड़ गए। अनाथ हो चुके बालक रामनरेश का पालन-पोषण उनके ननिहाल मोकलपुर (मड़ियाहूं) में हुआ। विपरीत परिस्थितियों ने उन्हें कमजोर नहीं बल्कि और अधिक दृढ़ बना दिया।

विद्यालय से ही जाग उठा राष्ट्रप्रेम

मिडिल स्कूल में अध्ययन के दौरान उनका संपर्क कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों से हुआ। देशभक्ति की भावना इतनी प्रबल थी कि उन्होंने स्वयंसेवकों के साथ बंदूक चलाने सहित अन्य प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। महात्मा गांधी के नेतृत्व में चल रहे आंदोलनों ने उनके मन में स्वतंत्रता के लिए कुछ भी कर गुजरने का जज्बा पैदा कर दिया।

व्यक्तिगत सत्याग्रह से शुरू हुआ जेल का सफर

वर्ष 1939 में उन्होंने व्यक्तिगत सत्याग्रह में सक्रिय भाग लिया। अंग्रेज सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर छह माह तक कारागार में रखा। जेल की कठोर यातनाओं के बावजूद उनका हौसला नहीं टूटा। जेल से बाहर निकलने के बाद उन्होंने नमक सत्याग्रह और फिर 'भारत छोड़ो आंदोलन' में भी बढ़-चढ़कर भाग लिया।

नौ महीने तक फरार रहे, परिवार पर भी हुआ अत्याचार

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उनकी सक्रियता से अंग्रेजी शासन बौखला गया। पुलिस लगातार उनकी तलाश करती रही। गिरफ्तारी से बचने के लिए उन्हें लगभग नौ महीने तक फरारी का जीवन जीना पड़ा। इस दौरान अंग्रेज अधिकारियों ने उनके परिवार पर भी तरह-तरह के अत्याचार किए और उनका घर तक जला दिया, लेकिन पंडित रामनरेश शर्मा ने आत्मसमर्पण नहीं किया।

बार-बार जेल भेजे गए

गिरफ्तारी के बाद अंग्रेजी शासन ने उनके खिलाफ कई मुकदमे दर्ज किए। उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार 16 अप्रैल 1941 को उन्हें कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई गई। जुर्माना न भरने पर अतिरिक्त कारावास भी भुगतना पड़ा।

23 दिसंबर 1944 को उन्हें पुनः गिरफ्तार किया गया। विभिन्न धाराओं में मुकदमा चलाकर एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी गई। बाद में स्वास्थ्य खराब होने पर उन्हें जौनपुर से प

सुल्तानपुर जेल स्थानांतरित किया गया, जहां उन्होंने दिसंबर 1945 तक कठोर एवं सश्रम कारावास की सजा काटी।

गीतों से जगाई देशभक्ति की अलख

पंडित रामनरेश शर्मा केवल आंदोलनकारी ही नहीं, बल्कि एक ओजस्वी जनजागरणकर्ता भी थे। विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार अभियान में उन्होंने गांव-गांव जाकर विदेशी कपड़ों पर सील लगवाई और लोगों को स्वदेशी अपनाने के लिए प्रेरित किया।

वे अपने जोशीले देशभक्ति गीतों से लोगों में आजादी की चेतना जगाते थे। उनके गीतों में अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध विद्रोह की स्पष्ट आवाज सुनाई देती थी। उनके गीत युवाओं के भीतर राष्ट्रभक्ति की ऐसी ज्वाला प्रज्वलित करते थे कि लोग स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़ने को प्रेरित हो जाते थे।

संघर्ष की कहानी खुद लिखी

पंडित रामनरेश शर्मा ने अपने संघर्षों को केवल जिया ही नहीं, बल्कि उन्हें शब्दों में भी संजोया। उनकी लिखी पुस्तक "आजादी की लड़ाई तथा जनपद जौनपुर" स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास का महत्वपूर्ण दस्तावेज मानी जाती है, जिसमें जौनपुर के स्वतंत्रता संग्राम का जीवंत चित्रण मिलता है।

जीवन का अंतिम अध्याय, लेकिन प्रेरणा अमर

4 दिसंबर 2003 को यह महान स्वतंत्रता सेनानी पंचतत्व में विलीन हो गया। हालांकि उनका शरीर आज हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनका त्याग, बलिदान, राष्ट्रभक्ति और संघर्ष आज भी नई पीढ़ी को प्रेरणा देता है।

नई पीढ़ी के लिए संदेश

आज जब देश आजादी का अमृतकाल मना रहा है, तब पंडित रामनरेश शर्मा जैसे गुमनाम सेनानियों के जीवन को याद करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। उन्होंने हमें यह सिखाया कि राष्ट्र सर्वोपरि होता है। आजादी हमें विरासत में नहीं मिली, बल्कि हजारों बलिदानों की कीमत पर प्राप्त हुई है।

पंडित रामनरेश शर्मा का जीवन इस सत्य का जीवंत प्रमाण है कि देशभक्ति केवल शब्द नहीं, बल्कि त्याग, तपस्या, संघर्ष और बलिदान का दूसरा नाम है। भारत माता के इस अमर सपूत को शत-शत नमन।

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  1. बहुत ही सुन्दर और सराहनीय ढंग से विश्लेषित और प्रस्तुत किया गया है। प्रतापगढ़ की जगह सुल्तानपुर पढ़ा जाय। हृदय से आभार व्यक्त करता हूं।

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  2. मैं कमला प्रसाद शर्मा स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी स्व पंडित राम नरेश शर्मा जी का पुत्र हूं। मेरी जानकारी में जो लेख पंडित राम नरेश शर्मा जी के बारे में लिखा गया है, बिल्कुल सही है। जौनपुर कारागार से उनका स्थानांतरण सुल्तानपुर जिला कारागार में किया गया था, गलती से प्रतापगढ़ हो गया है।

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