पिता ने बांस से बनाया जैवलिन... अब एशियन गेम्स में भारत के लिए जीता कांस्य

जौनपुर के लाल ने 84.35 मीटर भाला फेंककर दुनिया को दिखाया अपना दम

जौनपुर। कभी खेतों के किनारे बांस की लाठी को भाला बनाकर निशाना साधने वाला डभिया गांव का एक लड़का आज जापान के नागोया में भारत का झंडा ऊंचा कर रहा है। जिस हाथ में कभी संसाधनों के अभाव में बांस का भाला था, उसी हाथ ने अब 84.35 मीटर दूर जैवलिन फेंककर एशियन गेम्स का कांस्य पदक अपने नाम कर लिया। मछलीशहर तहसील के अदारी डभिया गांव निवासी रोहित यादव ने एशियन गेम्स के जैवलिन थ्रो फाइनल में कांस्य जीतकर जौनपुर ही नहीं, पूरे उत्तर प्रदेश को गौरवान्वित किया है।


जिस स्वर्ण पदक के लिए जौनपुर की निगाहें टिकी थीं, वह भले ही रोहित के हिस्से में नहीं आया, लेकिन उनका कांस्य पदक किसी सोने से कम नहीं है। प्रतियोगिता के शुरुआती तीन राउंड में रोहित का प्रदर्शन ऐसा रहा कि मैदान से लेकर जौनपुर तक हर दिल में गोल्ड की उम्मीद जग गई थी। अंतिम परिणाम में कांस्य मिला, लेकिन इस पदक के पीछे वर्षों की तपस्या, संघर्ष, पिता का सपना और बेटे का जुनून छिपा है।


जब जैवलिन खरीदने तक के पैसे नहीं थे, पिता ने बांस से बनाया भाला

रोहित की आज की चमक के पीछे संघर्ष की लंबी और बेहद भावुक कहानी है। मछलीशहर के अदारी डभिया गांव निवासी उनके पिता सभाजीत यादव छोटे किसान हैं और खुद मैराथन धावक रह चुके हैं। उन्होंने भी खेल की दुनिया में आगे बढ़ने का सपना देखा था, लेकिन सीमित संसाधनों के कारण उनका सपना अधूरा रह गया।


शायद यही वजह थी कि जब बेटे के हाथ में खेल का जुनून दिखाई दिया तो पिता ने उसे रोकने के बजाय उसके सपने को अपना सपना बना लिया।


जैवलिन खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। लेकिन सपनों को कीमत की जरूरत नहीं होती। सभाजीत यादव ने बांस से भाला तैयार किया और उसी को जैवलिन बनाकर रोहित के हाथ में थमा दिया। गांव के खेत, खुले मैदान और मिट्टी की जमीन उनका अभ्यास स्थल बन गए।


रोहित ने भी सुविधाओं की कमी को बहाना नहीं बनने दिया। वह रोजाना पांच से छह घंटे तक पसीना बहाते रहे। धूप हो या थकान, हाथ में बांस का भाला और आंखों में अंतरराष्ट्रीय पदक का सपना—यही उनका शुरुआती सफर था।


जिस बांस के भाले से उन्होंने शुरुआत की थी, वही संघर्ष आगे चलकर उन्हें असली जैवलिन और अंतरराष्ट्रीय मैदान तक ले गया।


टर्की में गोल्ड ने बदल दी जिंदगी

मेहनत रंग लाई और रोहित ने टर्की में आयोजित वर्ल्ड स्कूल गेम्स में स्वर्ण पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। यह सफलता उनके लिए महज एक पदक नहीं थी, बल्कि उस संघर्ष की पहली बड़ी जीत थी, जिसमें गांव की मिट्टी से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने का रास्ता खुला।


इस स्वर्ण के बाद रोहित के सपनों को जैसे पंख लग गए। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाए।


नीरज चोपड़ा से मुलाकात ने दिखाई नई राह

वर्ष 2019 में रोहित की मुलाकात जैवलिन स्टार नीरज चोपड़ा से हुई। इसके बाद उसी वर्ष दिसंबर में वह नीरज चोपड़ा के साथ प्रशिक्षण के लिए अफ्रीका गए। अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रशिक्षण और खिलाड़ियों के बीच रहकर अभ्यास करने का अनुभव रोहित के खेल के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ।


इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। विश्व चैंपियनशिप और कॉमनवेल्थ गेम्स जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी उन्होंने पदक हासिल किए। उनकी उपलब्धियों को देखते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने खेल दिवस के अवसर पर उन्हें सम्मानित किया।


अब नागोया में तिरंगा और डभिया में जश्न

एशियन गेम्स के फाइनल में जब रोहित ने 84.35 मीटर का सर्वश्रेष्ठ थ्रो किया तो उनके वर्षों के संघर्ष को एक और बड़ी मंजिल मिल गई। नागोया के मैदान में मिला कांस्य पदक डभिया गांव के उस संघर्ष की जीत है, जहां कभी संसाधन नहीं थे, लेकिन हौसले की कोई कमी नहीं थी।


आज रोहित के पदक के साथ उनके पिता सभाजीत यादव का वह अधूरा सपना भी जैसे पूरा हो गया, जिसे उन्होंने कभी खुद धावक बनकर देखा था। पिता ने दौड़ते हुए जो सपना नहीं जी पाया, बेटे ने जैवलिन थामकर उसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर साकार कर दिया।


बांस के भाले से शुरू हुआ सफर आज एशियन गेम्स के पोडियम तक पहुंच चुका है। डभिया की मिट्टी से निकला रोहित अब सिर्फ जौनपुर का नाम नहीं है—वह उन हजारों खिलाड़ियों के लिए उम्मीद है, जिनके पास सुविधाएं कम हैं, लेकिन सपने बहुत बड़े हैं।


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