भौरा की माटी से भारतीय विज्ञान के शिखर तक पहुंचे डॉ. सूर्य प्रकाश सिंह
नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज इंडिया के फेलो चुने गए, जौनपुर और पूर्वांचल का बढ़ाया गौरव
जौनपुर। जनपद की माटी ने एक बार फिर साबित कर दिया कि प्रतिभा संसाधनों की मोहताज नहीं होती। जिले के छोटे से गांव भौरा से निकलकर डॉ. सूर्य प्रकाश सिंह ने भारतीय विज्ञान के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का परचम लहराया है। उन्हें देश की सबसे पुरानी विज्ञान अकादमियों में शामिल नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज इंडिया (NASI) का फेलो चुना गया है। उनकी इस उपलब्धि से जौनपुर समेत पूरे पूर्वांचल का गौरव बढ़ा है।
डॉ. सूर्य प्रकाश सिंह की सफलता की कहानी इस बात की मिसाल है कि बड़े सपनों को पूरा करने के लिए महानगरों में जन्म लेना जरूरी नहीं है। उनकी प्रारंभिक शिक्षा पैतृक गांव भौरा से हुई। इसके बाद उन्होंने हाईस्कूल अमिहित इंटर कालेज तथा इंटरमीडिएट पब्लिक इंटर कालेज केराकत से किया। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय का रुख किया और वर्ष 2005 में रसायन विज्ञान में पीएचडी की उपाधि हासिल की।
इसके बाद उनका वैज्ञानिक सफर देश की सीमाओं से निकलकर जापान और अमेरिका तक पहुंचा। जापान के नागोया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में पोस्टडॉक्टरल शोध, ओसाका विश्वविद्यालय में वर्ष 2008 में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्य और एनआईएमएस सुकुबा में महत्वपूर्ण शोध के बाद उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक के साथ भी काम किया।
विदेश में शानदार करियर के बावजूद डॉ. सूर्य प्रकाश का देश से जुड़ाव कम नहीं हुआ। वर्ष 2011 में वे भारत लौट आए और सीएसआइआर-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी (IICT), हैदराबाद से जुड़ गए। उनके शोध कार्यों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। विशेष रूप से बीओडीआइपीवाई आधारित फ्लोरोसेंट डाई को माइटोकॉन्ड्रिया ट्रैकर्स के रूप में विकसित करने के क्षेत्र में उनके काम को उल्लेखनीय सफलता मिली। इसकी प्रोसेस टेक्नोलॉजी जापान की कंपनी टीसीआई को हस्तांतरित की गई है।
डॉ. सिंह के नाम 260 से अधिक अंतरराष्ट्रीय शोध प्रकाशन दर्ज हैं। विज्ञान के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें नासी यंग साइंटिस्ट प्लैटिनम जुबिली अवार्ड, एआरए यंग साइंटिस्ट अवार्ड, आईएनएसए फेलोशिप, केआरसी ब्रॉन्ज मेडल और एमआरसीआई मेडल समेत कई प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं।
नासी फेलो के रूप में उनका चयन एक जनवरी 2027 से प्रभावी होगा। दिसंबर 2026 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी में उन्हें औपचारिक रूप से फेलोशिप प्रदान किए जाने की जानकारी दी गई है।
विज्ञान के क्षेत्र में देश-विदेश में पहचान बनाने के बावजूद डॉ. सूर्य प्रकाश सिंह का अपने गांव भौरा से नाता आज भी कायम है। वे प्रतिवर्ष अपने गांव आते हैं और ग्रामीणों से उसी सहजता और आत्मीयता से मिलते हैं। उनके सरल एवं मिलनसार स्वभाव की गांव में भी चर्चा रहती है। उनका परिवार भी सामाजिक सरोकारों से जुड़ा हुआ है। उनके एक भाई गांव में ही नौकरी करते हैं, जबकि दूसरे भाई आजमगढ़ के पशुपालन विभाग में कार्यरत हैं।
डॉ. सूर्य प्रकाश सिंह का नासी फेलो के रूप में निर्वाचन उनके वैज्ञानिक योगदान की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उनकी यह उपलब्धि सीएसआइआर-आईआईसीटी के साथ-साथ जौनपुर और उत्तर प्रदेश के लिए भी गौरव का विषय है।

