आठ साल की उम्र में शुरू किया मूर्ति बनाने का कार्य , 28 की उम्र में मां दुर्गा को दे दी जीवंत आंखें
जनार्दन निषाद की कलाकारी ने किया हैरान, इलेक्ट्रिक डिवाइस और टाइमर से खुलती-बंद होती हैं मां की पलकें
महराजगंज, जौनपुर। बचपन में मिट्टी से खेलने और खिलौने बनाने का शौक कब जुनून में बदल गया, पता ही नहीं चला। महज आठ साल की उम्र में मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने की शुरुआत करने वाले जनार्दन निषाद ने 28 वर्ष की उम्र में अपनी कला से ऐसा कमाल कर दिखाया कि लोग उनकी कारीगरी देखकर हैरान रह गए। इस बार उन्होंने मां दुर्गा की ऐसी जीवंत प्रतिमा तैयार की है, जिसमें इलेक्ट्रिक डिवाइस और टाइमर की मदद से मां की आंखें खुलती और बंद होती हैं। उनकी इस अनूठी कलाकारी की क्षेत्र में खूब चर्चा हो रही है।
महराजगंज क्षेत्र के सराय पंडरी गांव निवासी सिकंदर निषाद के घर वर्ष 1999 में तीन बेटियों के बाद बेटे जनार्दन का जन्म हुआ। बचपन से ही जनार्दन की रुचि मिट्टी से खेलने और उससे तरह-तरह के खिलौने बनाने में थी। नवरात्र के दौरान पूजा पंडालों में स्थापित मां दुर्गा की प्रतिमाओं को देखकर उनके मन में भी प्रतिमा बनाने की इच्छा जागी। महज आठ वर्ष की उम्र में उन्होंने पहली बार मां दुर्गा की छोटी प्रतिमा बनाई और नवरात्र में अपने घर पर स्थापित किया।
पहली कोशिश को मिली सराहना ने उनके हौसले को पंख लगा दिए। अगले वर्ष उन्होंने दो प्रतिमाएं बनाईं, जिन्हें नजदीकी पूजा पंडालों में स्थापित किया गया। 12 वर्ष की उम्र तक आते-आते वह पांच प्रतिमाएं बनाने लगे। धीरे-धीरे उनकी कला निखरती गई और उन्होंने हर वर्ष प्रतिमाएं बनाकर पूजा समितियों को देना शुरू कर दिया।
जनार्दन ने बताया कि वर्ष 2017 में इंटरमीडिएट की पढ़ाई के बाद उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। तीन बहनों की शादी की जिम्मेदारी और खेती पर निर्भर पिता के सीमित संसाधनों के कारण परिवार का खर्च उठाना मुश्किल हो रहा था। ऐसे में उन्होंने अपने हुनर को ही आजीविका का जरिया बनाने का फैसला किया।
वर्ष 2019 में वह मूर्ति निर्माण की बारीकियां सीखने के लिए कोलकाता गए। वहां से कला का व्यावहारिक ज्ञान हासिल कर लौटे तो बड़े पैमाने पर प्रतिमाएं बनाने का काम शुरू कर दिया। मेहनत, लगन और लगातार अभ्यास ने उनके हुनर को नई पहचान दी।
जनार्दन के मुताबिक, इस वर्ष उन्होंने मां दुर्गा की कुल 50 प्रतिमाएं तैयार की हैं। ये प्रतिमाएं जौनपुर के महराजगंज और सुजानगंज विकासखंड के साथ ही प्रतापगढ़ जनपद की पट्टी तहसील क्षेत्र के विभिन्न पूजा पंडालों में स्थापित की जाएंगी।
इस बार उनकी सबसे खास उपलब्धि आंखें खोलने और बंद करने वाली मां दुर्गा की प्रतिमा है। इसमें इलेक्ट्रिक डिवाइस और टाइमर का इस्तेमाल किया गया है। तकनीक की मदद से हर पांच से दस सेकंड के अंतराल पर मां की पलकें खुलती और बंद होती हैं। प्रतिमा को इस तरह तैयार किया गया है कि मां की आंखों की हलचल उसे जीवंत स्वरूप प्रदान करती है और श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकती है।
जनार्दन बताते हैं कि प्रतिमा निर्माण में लकड़ी, पुआल और अन्य सामग्री के इस्तेमाल से लेकर रंगाई-पुताई तक का अधिकांश काम वह खुद करते हैं। मिट्टी से प्रतिमा का आकार देने और अन्य जरूरी कार्यों में वह सहयोगियों की मदद लेते हैं। हर वर्ष कुछ नया करने की कोशिश ही उनकी कला को आगे बढ़ा रही है।
आठ साल की उम्र में शुरू हुआ यह सफर आज एक ऐसे मुकाम पर पहुंच गया है, जहां जनार्दन निषाद अपनी मेहनत, रचनात्मकता और तकनीक के मेल से मां दुर्गा की प्रतिमाओं को नया रूप दे रहे हैं। सीमित संसाधनों के बीच अपने हुनर को पहचान बनाना और हर वर्ष कुछ नया कर दिखाना उनकी लगन की मिसाल है।

