जौनपुर जिला अस्पताल का ऑक्सीजन प्लांट रामभरोसे, ऑपरेटर नहीं; वार्ड ब्वाय के भरोसे मरीजों की सांसें!
जौनपुर। कोरोना महामारी के दौरान मरीजों को निर्बाध ऑक्सीजन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से अमर शहीद उमानाथ सिंह जिला चिकित्सालय में स्थापित ऑक्सीजन प्लांट की व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं। महामारी के दौरान करोड़ों की स्वास्थ्य व्यवस्था का हिस्सा बने ऑक्सीजन प्लांट के संचालन के लिए आज तक नियमित ऑपरेटर की नियुक्ति नहीं होने की बात सामने आई है। हालात यह हैं कि जरूरत पड़ने पर प्लांट चलाने की जिम्मेदारी एक वार्ड ब्वाय को सौंपी जा रही है। वहीं, सांसद निधि से स्थापित दूसरे ऑक्सीजन प्लांट के अब तक चालू नहीं होने का दावा भी किया जा रहा है। ऐसे में अस्पताल में भर्ती गंभीर मरीजों को समय पर ऑक्सीजन उपलब्ध कराने की व्यवस्था को लेकर सवाल उठना लाजिमी है।
प्रधानमंत्री निधि और सांसद निधि से लगाए गए थे प्लांट
कोरोना महामारी के दौरान अस्पतालों में ऑक्सीजन की किल्लत को देखते हुए केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री निधि से जिला अस्पताल में ऑक्सीजन प्लांट स्थापित किया गया था। इसके अतिरिक्त तत्कालीन सांसद श्याम सिंह यादव की निधि से भी दूसरा ऑक्सीजन प्लांट लगाया गया था। इन दोनों व्यवस्थाओं का उद्देश्य मरीजों को जरूरत के समय ऑक्सीजन उपलब्ध कराना था। लेकिन मौजूदा स्थिति को लेकर उठ रहे सवालों ने स्वास्थ्य विभाग की तैयारियों और रखरखाव की व्यवस्था पर ध्यान खींचा है।
ऑपरेटर की नियुक्ति नहीं, वार्ड ब्वाय संभाल रहा जिम्मेदारी
अस्पताल के ऑक्सीजन प्लांट के संचालन के लिए नियमित ऑपरेटर की नियुक्ति नहीं होने की बात सामने आई है। इस संबंध में मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. संजय कन्नौजिया ने बताया कि आवश्यकता पड़ने पर विभागीय स्तर पर प्रशिक्षित एक वार्ड ब्वाय से प्लांट का संचालन कराया जा रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि ऑपरेटर की नियुक्ति के लिए मुख्य चिकित्सा अधिकारी और जिलाधिकारी को लिखित रूप से अवगत कराया जा चुका है।
सवाल यह है कि जब जिला अस्पताल में गंभीर मरीजों का इलाज होता है और ऑक्सीजन जीवनरक्षक व्यवस्था का अहम हिस्सा है, तो इसके संचालन के लिए नियमित तकनीकी कर्मचारी की तैनाती अब तक क्यों नहीं हो सकी?
सांसद निधि वाला प्लांट हैंडओवर नहीं होने का दावा
सांसद निधि से स्थापित दूसरे ऑक्सीजन प्लांट को लेकर सीएमएस डॉ. संजय कन्नौजिया ने कहा कि यह प्लांट आज तक उन्हें हैंडओवर नहीं किया गया है। उनके अनुसार, इसे मुख्य चिकित्सा अधिकारी को हैंडओवर किया गया था और उनके मुताबिक प्लांट शुरू से ही संचालित नहीं हुआ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस प्लांट से उनका कोई लेना-देना नहीं है।
सीएमएस के इस बयान के बाद प्लांट की मौजूदा स्थिति, उसके रखरखाव और संचालन की जिम्मेदारी को लेकर संबंधित विभागों की भूमिका स्पष्ट करने की जरूरत है। आखिर जब सार्वजनिक धन से मरीजों की सुविधा के लिए प्लांट स्थापित किया गया, तो उसके संचालन की नियमित व्यवस्था सुनिश्चित क्यों नहीं की गई?
रखरखाव और तकनीकी व्यवस्था पर भी सवाल
सूत्रों के हवाले से प्लांट के रखरखाव, तकनीकी व्यवस्था और उसमें इस्तेमाल होने वाले रसायनों की स्थिति को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, इन दावों की पुष्टि के लिए तकनीकी निरीक्षण और संबंधित अभिलेखों की जांच आवश्यक है। यह स्पष्ट होना चाहिए कि प्लांट पूरी क्षमता से काम कर रहा है या नहीं, उसकी नियमित जांच कब होती है और किसी खराबी की स्थिति में वैकल्पिक व्यवस्था क्या है।
मरीजों की सुरक्षा सर्वोपरि, जवाबदेही तय होना जरूरी
जिला अस्पताल में भर्ती अस्थमा, हृदय रोग और अन्य गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए समय पर ऑक्सीजन मिलना बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में ऑक्सीजन प्लांट के संचालन, तकनीकी निगरानी और नियमित रखरखाव में किसी भी तरह की लापरवाही मरीजों के लिए जोखिम पैदा कर सकती है।
स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन को दोनों ऑक्सीजन प्लांट की मौजूदा स्थिति की तकनीकी जांच करानी चाहिए। साथ ही ऑपरेटर की नियुक्ति, रखरखाव की जिम्मेदारी और वैकल्पिक ऑक्सीजन व्यवस्था के संबंध में भी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, ताकि मरीजों की सांसों से जुड़ी इस अहम व्यवस्था में किसी तरह की अनिश्चितता न रहे।

